मंत्री जी का रैंप वॉक

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हर्षिता वंत्रप 

इंदौर – लोगों के पास वाक़ई मुद्दों की कमी हो गई है। कोरोना के बाद दुनिया थोड़ी रंगहीन स्वादहीन-सी हो गई है। तो उन लोगों को परेशानी है जिन्हें ग़ालिब के शब्दों में ‘ इक गूना बेख़ुदी दिन रात चाहिए।’ वे ढूँढते हैं कि कहीं कुछ तो मिले चटपटा-सा। इस बार उन्होंने ढूँढा तो कमल पटेल जी के कथित रैंप वॉक को ढूँढा।

लेकिन क्या वे सचमुच कोई मॉडलिंग कर रहे थे। वे महिला पत्रकार संघ वुमंस प्रेस क्लब मध्यप्रदेश, के एक कार्यक्रम में थे और रैंप पर अकेले नही आये थे, उनके साथ क्लब की दो पदाधिकारी पत्रकार थीं। और वह इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे और उनका रैंप पर आना इतना ग्रेसफुल था कि हम लोगों को आश्चर्य हुआ था। यह ट्रंप के रैंप पर वॉक जैसी वॉक नहीं थी कि जिसमें वे हाँफ ज़्यादा रहे थे। यह तो एक द्रुत वॉक थी जिसमें उन्होंने पूरी गरिमा से दर्शकों का अभिवादन किया था। उनका कॉस्ट्यूम नहीं, उनका कान्फीडेंस जो उन्होंने महिला पत्रकारिता में इस वॉक के ज़रिए व्यक्त किया, वह महत्व का था।

यह कार्यक्रम रैंप पर महिला पत्रकारों के वॉक का कार्यक्रम था। अगर मंत्री जी रैंप स्केटिंग करते तो क्या ऐसी प्रतिक्रियाएँ आतीं? मतलब आपत्ति वॉक से है, रैंप से नहीं।
लेकिन आज हम जिस तत्काल प्रतिक्रिया के संसार में रह रहे हैं, वहाँ हमारे मुख्य अतिथि को मॉडल कहकर चटखारा लेने वाले कम नहीं हैं। सोंचने वाली बात क्या वह किसी डिज़ाइनर का विज्ञापन था? कोई मनीष मल्होत्रा? कोई संदीप खोसला? कोई सुकेत धीर? लेकिन ऐसे तो कोई दावेदार वहाँ न थे। क्या वह किसी ज्यूलरी का विज्ञापन था? कोई सब्यसाची मुकर्जी? कोई राघवेंद्र राठौर? कोई वरुण जानी? क्या ऐसा कोई आभूषण डिज़ाइनर वहाँ था? यदि नहीं तो फिर ये बात कहाँ से आई? यह कोई हाई-फैशन शो नहीं था और हमारे मुख्य अतिथि एक सादा लिबास में थे। मजीद अहमद के एक शे’र की याद आ गयी : उस मोड़ पर अभी जिसे देखा है कौन था/ संभली हुई निगाह थी सादा लिबास था।
असल बात तो एक क़दमताल की थी जिसमें हम लोग भी कार्यक्रम संयोजकों की तरह शामिल थे। हमारे मुख्य अतिथि ने हमारे साथ दर्शकों का अभिवादन कर कार्यक्रम के उद्देश्य के साथ सॉलिडेरिटी का परिचय दिया था। उन्होंने हमारी पत्रकारिता और हौसला अफजाई के लिए इसमें शिरकत की। उनके होने से हमारा कार्यक्रम एक कैटवॉक ईवेंट कहलाने से बच गया अन्यथा कुछ दिलजले यों भी महिला पत्रकारिता से जले भुने बैठे हैं।
महिला पत्रकारिता सिर्फ़ बरखा दत्त या निधि राज़दान या राना अय्यूब तक ही सीमित नहीं है, अब इसने मध्यप्रदेश के राजभोगी शहरों से लेकर मुफस्सिल कस्बों तक में जगह बनाई है। और यह पत्रकारिता अपनी तरह से अभिव्यक्ति के ख़तरे उठा ही नहीं रही है बल्कि स्वयं कई तरह के ख़तरों का सामना कर रही है। यह एक वैश्विक ट्रेंड है।

वुहान में फैले कोरोना की लाइव रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकार को चार साल के लिए जेल में डाल दिया गया। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानों ने महिला पत्रकारों को टीवी एंकरिंग करने से रोक दिया। इसलिए महिला पत्रकारिता को सॉलिडेरिटी की ज़रूरत है। भारत में जब लोग एक राजनीतिक व्यक्ति के महिला पत्रकारों के साथ क़दमताल करने की प्रशंसा न कर उसकी आलोचना करते हैं तब वे ऐसे अत्याचारों पर ख़ामोश रहते हैं और यही इस प्रसंग की वास्तविक त्रासदी है। यह भारतीयता की जीत है कि यहाँ महिलाओं की मीडिया में उपस्थिति को यों प्रोत्साहित किया जाता है जबकि हमारे अड़ोस पड़ोस के देशों में उन्हें इतनी ज़िल्लत झेलनी पड़ती है।

और महिला पत्रकारिता के ख़तरे महिलाओं को समाज में खड़े हो रहे नये ख़तरों से अलग नहीं हैं। वहाँ अफ़ग़ानिस्तान में जब महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में अभी जब मोर्चे निकलने लगे तो उन जुलूसों को कवर करने वाली पत्रकारों को पीटा गया। कोई महिला पत्रकार कवरेज के लिए निकले तो वे पूछ रहे हैं कि आप घर से बाहर कैसे निकल रही हैं, मोहतरमा। यानी तालिबानी राज्य महिलाओं के लिए एक स्थाई कर्फ़्यू है।भारत में इसकी आलोचना नहीं होगी, बल्कि इसकी होगी कि महिला पत्रकारिता का साथ कैसे दे दिया? मतलब ऐसे लोगों के भीतर भी क्या कहीं एक सूक्ष्म तालिबानी छुपा है?

लेकिन जैसा कि महिलाओं के लिए मार्चिंग करने वाली औरतों के बारे में जेम्स ओपनहीम ने लिखा था:
As we come marching, marching, we battle too for men,
For they are women’s children, and we mother them again.
कि उनका मार्च पुरुषों के लिए भी है क्योंकि वे महिलाओं के ही बच्चे हैं, उसी तरह से जागरूक चेतना के लोग यह जानते हैं कि रैंप पर यह वॉक एक वॉक नहीं है, एक मार्च है सत्य के साझा-संधान के लिए।
शीतल रॉय अध्यक्ष वुमंस प्रेस क्लब म.प्र.