क्यों न रिटायर्ड जज से कराई जाए मेडिकल यूनिवर्सिटी जबलपुर में हुए पास-फेल घोटाले की जाँच -हाईकोर्ट

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रोहित नैय्यर ब्यूरो जबलपुर 

मप्र हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि मेडिकल यूनिवर्सिटी जबलपुर में हुए पास-फेल घोटाले की जाँच क्यों न हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज से कराई जाए। चीफ जस्टिस मोहम्मद रफीक और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बैंच ने राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि इस मामले में निष्पक्ष जाँच के लिए अभी तक क्या कदम उठाए गए। डिवीजन बैंच ने इस मामले में डॉ. वृंदा सक्सेना, डॉ. जेके गुप्ता, डॉ. तृप्ति गुप्ता, डॉ. आरपी पांडे और परीक्षा कराने वाली ठेका कंपनी को दी गई अंतरिम रोक को बरकरार रखा है। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को निर्धारित की गई है। इंदिरा गांधी वार्ड गढ़ा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद मिश्रा और प्रेमनगर निवासी अंकिता अग्रवाल की ओर से दो अलग-अलग जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा कराई गई जाँच में पाया गया है कि मेडिकल यूनिवर्सिटी जबलपुर में ऐसे कॉलेजों के छात्रों को परीक्षा में शामिल कर लिया गया, जिनकी मान्यता ही नहीं थी। फेल छात्रों को पास कर दिया। परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएँ बाथरूम में पाई गईं। प्राइवेट कंपनी को ई-मेल भेजकर कई छात्रों के नंबर बढ़वाए गए। मामले की रिपोर्ट आए दो महीने से अधिक समय होने के बाद भी मामले में अभी तक कार्रवाई नहीं की गई। इससे प्रदेश के 80 हजार डॉक्टर्स, नर्स और पैरामेडिकल छात्रों का भविष्य दाँव पर लग गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ और अधिवक्ता आरएन तिवारी ने तर्क दिया कि मेडिकल यूनिवर्सिटी में चल रहे घोटाले से स्पष्ट है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में फर्जी और अपात्र डॉक्टर्स और नर्स तैयार हो रहे हैं। घोटाले की शुरुआत माइंडलॉजिक्स कंपनी को परीक्षा कार्य का ठेका दिए जाने के बाद हुई। हालत यह है कि जाँच समिति के अध्यक्ष डॉ. जेके गुप्ता को पद से अलग कर दिया गया। कुलपति डॉ. टीएन दुबे को दबाव में 14 अगस्त को इस्तीफा देना पड़ा। परीक्षा नियंत्रक डॉ. वृंदा सक्सेना को कोरोना होने के बाद डॉ. तृप्ति गुप्ता को परीक्षा नियंत्रक का प्रभार दिया गया था। डॉ. तृप्ति गुप्ता ने ही घोटालों को उजागर किया। इस मामले में उन्हें भी पद से अलग कर दिया गया है। वहीं डॉ. वृंदा सक्सेना को आरोपों के बावजूद पद पर बहाल रखा गया है। श्री नागरथ ने इस मामले में आवेदन प्रस्तुत कर मामले की जाँच रिटायर्ड हाईकोर्ट जज से कराए जाने का अनुरोध किया है। जाँच रिपोर्ट से यह भी खुलासा हुआ है कि छात्रों को पास-फेल कराने के मामले में ऑनलाइन लेन-देन हुआ है। इसके बाद भी मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई कॉलेजों के परीक्षा के दो साल बाद भी परिणाम घोषित नहीं किए गए हैं, जिससे छात्र भटक रहे हैं। अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता ने आवेदन दायर कर कहा है कि मेडिकल कॉलेज में पास-फेल कराने का पूरा खेल कम्प्यूटर और ई-मेल के जरिए हुआ है। मामले में ऑनलाइन लेन-देन के भी प्रमाण मौजूद हैं, इसलिए मामले की जाँच एक्सपर्ट एजेन्सी इंडियन कम्प्यूटर एमरजेन्सी रिसर्च टीम से कराई जानी चाहिए।