पर्यावरण संरक्षण हेतु संस्कृत साहित्य में राष्ट्रीय अन्तर्जालीय संगोष्ठी का आयोजन, देशभर के संस्कृत साहित्य के विद्वान जुड़े

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हेमंत वर्मा 
राजनांदगांव। विगत 22 जुलाई 2021 को शासकीय कमलादेवी राठी महिला महाविद्यालय राजनांदगाव (छ.ग.) में ऑन लाइन राष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी का अपरान्ह 3 बजे संस्कृत साहित्य में पर्यावरण संरक्षण विषय पर आयोजन किया गया। संगोष्ठी का प्रारंभ कार्यक्रम समन्वयक एवं संयोजन डॉ. सुषमा तिवारी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। संगीत विभाग से श्रीमती रामकुमारी धुर्वा ने सुमधुर ध्वनि से मंगलाचरण किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन के रूप में महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सुमन सिंह बघेल ने कालिदास के साहित्य में विद्यमान पर्यावरणीय तत्वों की महत्ता को बताते हुए कार्यक्रम आयोजन की सफलता की कामना कर बधाई दी। तत्पश्चात डॉ. सुषमा तिवारी ने कार्यक्रम का उद्देश्य बताते हुए संस्कृत साहित्य में निहित पर्यावरण संरक्षण के सूत्रों को सप्रमाण स्थापित किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में जुड़े डॉ. भावप्रकाश गाँधी (सरकारी नियमन कॉलेज, गांधी नगर गुजरात) का परिचय एवं वाचिक स्वागत शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डॉ. दिव्या देशपांडे ने दिया।
डॉ. गांधी ने पर्यावरण संरक्षण के उपायों पर प्रकाश डालते हुए बताया की मनुष्य के अंतर्निहित पर्यावरण के द्वारा ही बाह्य पर्यावरण संरक्षण संभव हैं। तेनत्यक्तेनभुन्जीथाः अर्थात त्याग के द्वारा पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में सराहनीय प्रयास हैं।
डॉ. सुषमा तिवारी ने लौकिक संस्कृत साहित्य में पर्यावरण विषय के लिए द्वितीय वक्ता डॉ. प्रवीण पंड्या को आमंत्रित किया, जो की राजस्थान के जालोर जिले में प्रधानाचार्य हैं। उन्होंने वाल्मीकि, माघ, भास्ए कालिदास, भावभूति, भारवी, बानभट्ट आदि प्राचीन संस्कृत कवियों की दृष्टि में पर्यावरण संरक्षण की दिशा मेंकृत वर्णनों का उल्लेख करते हुए प्राचीन संस्कृत साहित्य की भूमिका को उप स्थापित किया।
तृतीय वक्ता संस्कृत विद्वान डॉ. नवनिहाल गौतम, सहायक आचार्य डॉ. हरी सिंह गौर वि.वि. सागर का परिचय, वंवाचिक स्वागत डॉ. राघवेन्द्र शर्मा, सहायक प्राध्यापक, शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, रायपुर ने किया। डॉ. गौतम ने अपने उद्बोधन में इक्कीसवी शताब्दी में संस्कृत में पर्यावरण विषय में पर्यावरण के वास्तविक स्वरुप को उभारने का प्रयास किया। उन्हों ने बताया कि आज संस्कृत कविगण प्राकृतिक तत्वों को देव-तुल्य एवं पूजन योग्य ही नहीं मानते वरन उनका संरक्षण हेतु प्रयास करते हैं। संगोष्ठी के अंत में प्रश्नोत्तर द्वारा प्रतिभागियों की शंकाओं का समाधान मुख्य वक्ताओं द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में लगभग 10 राज्यों से अधिक शोधार्थियों ने भाग लिया। छत्तीसगढ़ से राजनांदगांव, दुर्ग, जांजगीर, सरगुजा, रायपुर, भिलाई, महासमुंद, बिलासपुर, रायगढ़, अंबिकापुर, खैरागढ़, राजस्थान से जयपुर, जोधपुर, जलावार, मध्यप्रदेश से सागर, भोपाल, रीवा, उज्जैन, ग्वालियर, सिवनी, दमोह, शहडोल, होशंगाबाद इंदौर, पांडिचेरी, इलाहबाद और दिल्ली के शोधार्थियों ने भाग लिया।
इसमें 10 विश्व विद्यालय के महाविद्यालयों जैसे हेमचंद यादव यूनिवर्सिटी दुर्ग, शहीद नंदकुमार पटेल यूनिवर्सिटी रायगढ़, इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय खैरागढ़, पंडित रविशंकर शुक्ल विश्व विद्यालय रायपुर, हरी सिंह गौर यूनिवर्सिटी सागर, केन्द्रीय संस्कृत विश्व विद्यालय भोपाल परिसर, गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्व विद्यालय बिलासपुर (छत्तीसगढ़), जगद्गुरु रामानंदाचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी जयपुर (राजस्थान), जीवाजी यूनिवर्सिटी ग्वालियर, श्री सोमनाथ संस्कृत यूनिवर्सिटी वेरावल, संत श्री गहिरा गुरू विश्व विद्यालय अंबिकापुर (छत्तीसगढ़), यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता, विश्व-भारती, शांति निकेतन, बनस्थली यूनिवर्सिटी राजस्थान, बाबा मस्तनाथ यूनिवर्सिटी, बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी भोपाल, जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी से आदि लगभग 100 प्राध्यापक, शोधार्थी व संस्कृत के विद्यार्थी प्रतिभागी रहे।
सम्प्राप्त फीड बैक के द्वारा यह गोष्ठी अभी तक के प्रदेश की सफल अन्तर्जालीय राष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठियों में से एक हैं। कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन डॉ. हरप्रीत कौर गरचा, सहायक प्राध्यापक, अंग्रेजी ने किया। तकनीकी क्षेत्र में सहयोग सुश्री पूर्णिमा तिवारी और गोविंद कुमार ने किया हैं। यह जानकारी कार्यक्रम संयोजिका डॉ. सुषमा तिवारी ने दिया।