दरिद्रता दुख का कारण नहीं अपितु दरिद्रता के प्रति आशक्ति दुख का कारण है- ब्र.रविन्द्र जी

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प्रद्युमन फौजदार
बडामलहरा/जो व्यक्ति अपने में संतुष्ट होगा जगत की कोई वस्तु उसे आकर्षित नहीं कर सकती। पाजिटिव सोच के साथ चलें अन्यथा जीरो हो जायेंगें उपर्युक्त उद्गार बाल ब्रह्मचारी रविन्द्र जी आत्मन ने तीर्थधाम सिद्धायतन में आयोजित ज्ञान गोष्ठी एवं पंचास्तिकाय विधान के समापन अवसर पर अंतिम उपदेश में साधर्मीजनों को संबोधित करते हुये व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि जो भगवंतों के दर्शन करता है उसे मोक्षमार्ग तो मिलता ही है साथ ही लौकिक अनुकूलता मिलती है और उसे अनुकूलता में भेदज्ञान करने का पुरुषार्थ मिलता है।ब्रह्मचारी जी ने कहा आध्यात्म साथ में चलना चाहिए अन्यथा जीरो हो जायेगे।अपने बिषयों का अपना समझना,बाहरी बिषय में नहीं रमना।कषाय करना जितना पाप है कषाय कराना भी उतना पाप है। प्रतिकूलता दुख का कारण नहीं प्रतिकूलता का स्वभाव दुख का कारण है,दरिद्रता दुख का कारण नहीं इच्छा और दरिद्रता के प्रति आशक्ति दुख का कारण है। उन्होंने कहा कि मुनिराज को आहार लेते समय आहार कैसे लिया जाता है ये सीखना चाहिए न कि आहार में क्या ले रहे ये देखना चाहिए।यदि बुखार है तो हित कचौरी खाने में नहीं कड़वा काढा पीने में है अर्थात रोग के अनुसार औषधि होती है रोगी के अनुसार नहीं।

मित्र से चरित्र की प्राप्ति ह़ोती है।हेय को हेय जानना उसका नाम जानना है।मैं को मैं जानना उसका नाम जानना है।आगम चक्षु से देखो,भैदज्ञान के चक्षु से देखो समता से सहन करना योग्य है।दुर्लभ जिनेन्द्र भगवान का आश्रय पाकर
अज्ञान मिटाने का नहीं ज्ञानाभ्यास करने का उद्यम करो तो अज्ञान स्वमेव छूट जायेगा। विधान का नाम आचरण है। विधान सफल करें और जन्म सफल करें इस अवसर पर सिद्धायतन ट्रस्ट के ट्रस्टी और देश के जानेमाने विद्वान जैनदर्शनाचार्य पं.अभय कुमार जी दवलाली ने कृतज्ञता ज्ञापित करते हुये कहा कि आपका अंतिम संदेश हुया विधान सफल हुआ हमें अपने को पूर्ण देखना। प्रत्येक कार्य पूर्ण होने के लिये होना चाहिए।इस दौरान सिद्धायतन की आगामी कार्ययोजना भी तैयार की गई जिसमें साल 2020 के कार्यक्रम तय किये गये।

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