हमे दान धर्म दीन हीनो की सेवा एवं माता पिता की सेवा करनी चाहिए – आचार्य मदन मोहन दास जी महाराज

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रविकांत बिदोल्या scn न्यूज़ ब्यूरो।।
हटा – आज तक जग संसार में कोई स्थिर नहीं रह पाया मौत सभी की आती है इसलिए जीवन में हमेशा सत्कर्म करने चाहिए ताकि मृत्यु मंगलमय हो सके। मृत्यु जिसकी मंगलमय होती है वह कभी उससे घबराता नहीं है और सत्कर्म करने वाला व्यक्ति मृत्यु से घबराता नहीं। वह उसे प्रेम पूर्वक आलिंगन करता है लेकिन जो हट धर्मी आसुरी प्रवृत्ति होता है। वह मृत्यु को समाप्त करने का प्रयास करता है। उक्त सदविचार एडीजे कोर्ट के बाजू से आहूत श्रीमद भागवत कथा के अंतिम दिवस में आचार्य मदन मोहन दास जी महाराज के द्वारा कहे गए हैं।

उन्होंने कहा कि यह संसार सागर एक मोह माया है क्योंकि जब तक हमारी सांस चलती है। तभी तक हमारे रिश्ते नाते हमारे साथ होते हैं और जैसे ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं तो उसके बाद सारे रिश्ते नाते खत्म हो जाते हैं इसलिए जीवन जीते हमें दान धर्म दीन हीनो की सेवा माता पिता की सेवा करनी चाहिए ताकि मृत्यु उपरांत भी हमारे कर्म को याद किया जाए और परलोक सुधर जाए। महाराज श्री ने कहा कि धनी व्यक्ति कभी किसी पर भरोसा नहीं करता और ना ही वह कभी सत्य बोलता है क्योंकि हमेशा धन ही झूठ बोल पाता है। धन ऐसा है जिसके लिए पति अपने पत्नी से और पत्नी अपने पति से भी झूठ बोलने से नहीं चूकते लेकिन थोड़ा सा विचार किया जाए। क्या धन कभी स्थाई रहा है। कहीं कोई मोदी जी जैसा आ गया। एक ही रात में हमारे उन छुपे हुए नोटों की कीमत खत्म हो जाती है। यहां पर भागवत कथा के विविध प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि वेद पुराणों में ब्राह्मण को भूसूर कहा गया है। यानी ब्रह्मण पृथ्वी का देवता हैं उसके चरणों और उसकी वाणी में धन होता है। ज्ञान का पूजन और सम्मान से ठाकुर जी स्वयं प्रसन्न होते हैं और ब्राह्मण का अपमान पाप माना जाता है। विदुर नीति में कहा गया है धनी होकर दाना करने वाला व्यक्ति भी दरिद्र माना गया है। सुदामा चरित्र का व्याख्यान करते हुए कहा गया कि सुदामा की पत्नी के मन में सदा ही अभाव बना रहता था कि कम से कम इतना तो हो हम अपना परिवार पाल सकें और कोई साधु आता है तो उसका भी पेट भर सकें। कथा में कहा गया कि अगर कोई याचक आपके घर आता है तो उसको कुछ ना कुछ अवश्य ही देना चाहिए। जितनी अपनी सामर्थ रहे अन्न कपड़े दान कर देना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि सुदामा जब अपने मित्र द्वारकाधीश से मिलने जाने लगे तो उनकी पत्नी ने एक पोटली में चने बांध दिए और जब सुदामा जी द्वारकाधीश के सामने पहुंचे तो ठाकुर जी ने भावुक होकर उन्हें गले लगा लिया। धार्मिक आयोजन के अंतिम दिवस में सुदामा चरित्र का जीवंत चित्रण झांकी के माध्यम से किया गया। गौतम परिवार द्वारा आयोजित के अंतिम दिवस कथा के मुख्य यजमान प्रेमरानी कन्हैयालाल गौतम और श्रीबाई भगवत प्रसाद गौतम के साथ बड़ी संख्या में श्रोताओं ने कथा श्रवण कर धर्म लाभ अर्जित किया।

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