काजली-कनौजिया में बुद्ध ही बुद्ध, पांचवी शताब्दी की बुद्ध मूर्तियां एवं बौद्धकाली शिल्पकला पाई गई

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अनिल गोयर
बैतूल।  
भारत में मध्यप्रदेश के बैतूल जिले से 30 किलोमीटर दूरी पर आमला तहसील है, यहां से 5 किलोमीटर दूरी पर पूर्व दिशा में बेल नदी के किनारे ग्राम कनौजिया है वहीं से कुछ दूरी पर काजली ग्राम है। ग्राम काजली-कनौजिया में खेत-खलिहानों में, घर-आंगन के भीतर और बाहर, दीवारों में, विभिन्न मंदिरों की दीवारों में बाहर एवं भीतर, स्कूल के अंदर परिसर में, गांव की गलियों में, तालाबों में भीतर  एवं किनारे पर  मैदानों में बुद्ध ही बुद्ध की मूर्तियां एवं बुद्ध से संबंधित शिल्पकला मौजूद है।


जिला पुरातत्व एवं आदिवासी कला संस्कृति संघ के सचिव एवं जयवंती हॉक्सर शासकीय स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय बैतूल के प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग डॉ. आरजी पांडे के अनुसार बैतूल जिले के प्रमाणिक एवं क्रमबद्ध इतिहास सातवीं सदी के बाद का प्राप्त होता है। सातवीं सदी के पूर्व इतिहास का अनुमान है कि मगध राज्य के शासकों का भी विदर्भ पर नियंत्रण एवं शासन रह चुका है। इसलिए सालबर्डी में बुद्धकालीन तीन बौद्ध गुफा एवं बौद्ध विहार साक्ष्य प्रमाण मौजूद हैं। डॉ. आरजी पांडे के अनुसार काजली का प्राचीन नाम करजमलय था।  बैतूल जिले के प्रमाणिक क्रमबद्ध इतिहास सातवीं सदी के बाद प्राप्त होता है परंतु डॉ. पांडे के अनुसार ही मगध राज्य के शासक का भी होशंगाबाद, विदिशा एवं बैतूल के क्षेत्र में शासन रह चुका होगा। इसी कारण से पांचवी शताब्दी में बुद्ध की मूर्तियां एवं बुद्ध से संबंधित शिल्पकला का विकास हुआ होगा।


जयवंती हॉक्सर शासकीय स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय बैतूल के प्रोफेसर, बॉयोटेक्नालॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष शोधकर्ता डॉ. सुखदेव डोंगरे के अनुसार काजली-कनौजिया बेल नदी के किनारे तथा आमला नजदीक बसा हुआ है। यहां पर अन्वेषण के दौरान ज्ञात हुआ है कि काजली-कनौजिया में 12 तालाब मौजूद थे। जिसमें से 4 तालाब अभी वर्तमान में जीवित हैं। काजली में खेतों किनारे उत्तर दिशा में नाले में अनेकों बुद्ध की मूर्तियां, खंडित अशोक चक्र, कमल की शिल्पकला, धम्मचक्र, बाघ, सिंह, हाथी, घोड़े, बैल, नाग के फन की मूर्ति की शिल्पकला मौजूद है। शिल्पकला के बीच में छोटे-छोटे स्तूप बने हैं। नाले में अनकों बौद्धकालीन शिल्पकला युक्त स्तंभ एवं पिलर मौजूद हैं। भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा, पद्मपानी, वज्रपानी बुद्ध प्रतिमा, अभय मुद्रा, वरद मुद्रा, कर्ण मुद्रा, वज्र मुद्रा, वितर्क मुद्रा, मैत्री बुद्धा, ध्यान आसन मुद्रा, अवलोकितेश्वर बुद्ध, यक्ष-यक्षनी, दूसरी शताब्द के बुद्ध शीर्ष गंधार कालीन  के अलावा भी विभिन्न अवस्थाओं की सैकड़ों मूर्तियां मौजूद हैं। काजली में भगवान बुद्ध के पिता शुद्वोधन, माता महामाया, महाप्रजाति, पत्नी यशोधरा, पुत्र राहुल, सेवक, छन्न, अश्व कत्थक की मूर्ति मौजूद है। काजली में हनुमान मंदिर के भीतर और बाहर भगवान बुद्ध की मूर्तियां एवं बौद्धकालीन शिल्पकला मौजूद है। काजली में ही माता का मंदिर है।

जिसमें भगवान बुद्ध की दोनों माताएं महामाया एवं महाप्रजापति की मूर्ति मौजूद है। ग्रामीण यहां मौजूद महामाया और महाप्रजापति को ही मातामैया समझते हैं और इसकी पूजा करते हैं। कनौजिया में तालाब के किनारे शिव मंदिर में मात्र एक शिवलिंग है। इसके अलावा इसी मंदिर में भगवान बुद्ध की विभिन्न मुद्रा वाली लगभग 50 मूर्तियां मौजूद है पास में ही गायकी मंदिर है इस मंदिर में भी भगवान बुद्ध की ही मूर्तियां मौजूद है। काजली-कनौजिया के ग्रामीणजनों को बुद्ध की मूर्तियों के बारे में जानकारी नहीं है। वे लोग भगवान बुद्ध की मूर्ति को विष्णु की मूर्ति बताते हैं। भगवान की कई मूर्तियों पर सिंदूर पोत दिया गया है। जिससे मूर्ति की मूल संरचना एवं सुंदरता प्रभावित हुई है। काजली में एकमात्र भगवान महावीर स्वामी की मूर्ति भी भगवान बुद्ध की मूर्तियों के साथ में मौजूद है।


शोधकर्ता को काजली-कनौजिया में शोध के लिए अमित हुरमाड़े, भीमराव निरापुरे, मिलिंद बौद्ध, दुर्गासिंह मर्सकोले, शंकर शेषकर, नालंदा शेषकर, डीएच मासोदकर, कमलेश खातरकर, लखनलाल सराठे, रामदयाल सराठे सहित ग्रामीणों ने सहयोग किया।
शोधकर्ता डॉ. सुखदेव डोंगरे को ग्रामीणजनों ने बताया कि काजली-कनौजिया की मूर्तियां जिला पुरातत्व म्यूजियम नेहरू पार्क में ले गई तथा नागपुर के म्यूजियम में भी यहां से मूर्तियां वहां ले जाई गई है। उन्होंने यह भी बताया कि पुरातत्व विभाग का नाम बताकर लोग दिन में आते हैं और रात में मूर्तियां गायब हो रही है। डॉ. सुखदेव डोंगरे द्वारा सालबर्डी में मौजूद बौद्ध गुफा, बौद्ध स्तूप एवं बौद्ध विहार और खेड़ला किले के गोंड राजाओं के इतिहास पर भी शोधपत्र प्रकाशित कर चुके हैं।