वस्तु का स्वरूप धर्म है समवशरण विधान के दौरान मुनि विरंजन सागर ने कहा इंद्रों के सवालों के उत्तर दिये मुनिश्री ने

Scn news india

प्रद्युमन फौजदार
बडामलहरा/धर्म का स्वरूप क्या है भरत चक्रवर्ती ने बडामलहरा के द्रोणगिरि भवन में चल रहे समवशरण विधान के दौरान धर्मसभा में मुनि श्री विरंजन सागर से प्रश्न किया जिसके उत्तर में मुनि श्री ने कहा वस्तु का स्वभाव ही धर्म है जिस चीज को हम धन मान रहे हैं वह धर्म नहीं है अभी हम पूजन कर रहे हैं इसे धर्म मानते हैं ये तो धर्म की क्रियाएं है धर्म अलग है धर्म ना पंत में है न धर्म का कोई अंत है धर्म को धर्म का कोई विभाजन नहीं है आज धर्म के नाम पर कितना विभाजन है कोई द्रव्य चढ़ाकर कोई पूजन करके अगरबत्ती लगाकर पक्षियों को दाना डाल कर चीटियों को दाना खिला कर धर्म कर रहा है जबकि धर्म हमारे अंतरंग में है धम्मो दया विशदो अर्थात जहां दया है वहां धर्म है।

आप के परिणामों में दया आ जाए वह धर्म है अनुष्ठान के निमित्त से जान सकते हैं हम धर्म की क्रियाओं में बदलाव कर सकते हैं धर्म में नहीं जैन दर्शन में चार चीजों को जान लिया धर्म जान लिया अनेकांत,स्याद्वाद बाहरी क्रियाओं को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है पहचान के लिए नाम रखते हैं निश्चय से देखें तो ना आत्मा का जन्म होता है ना आत्मा का मरण होता है आत्मा का कोई आकार नहीं होता व्यवहार से पहचान कराई गई है नाम की कुछ लोग सोचते हैं इतना वैभव दिखाने की क्या जरूरत है और वह व्यक्ति सोचता है इतना वैभव मुझे मिला है पुण्य के उदय से तो धन संपदा सही लग रही है आज हम अपने अंतरंग को समझने आए हैं निश्चय अंदर का है व्यवहार बाहर का है यह सारी क्रियाएं अंतरंग की विशुद्धि समवशरण देखकर अच्छे भाव बन रही है मानस्तंभ को देखकर हमारे विभागों की विशुद्धि बन जाती है हमारी आत्मा का ना कोई करता है ना कोई हरता है।

सुख दुख सब हमारे कर्मों में आ रहा है धर्म स्वरूप को नहीं जान पाता है जीव धर्म अंतरंग का विषय है समय के रहते समय की कीमत जानना है दीवार की क्रियाओं से जो संकल्प विकल्प आ रहा है धर्म कहीं उस से ऊपर उठकर है कौन क्या कर रहा है मुझे क्यों नहीं बुलाया है कहां बैठना है यह सब छोड़िए और भावों से जुड़ जाइए। इस दौरान समवशरण विधान के मुख्य पात्र सौंधर्म इन्द्र शील डेवडिया ने प्रश्न किया कि समवशरण में पूजा का क्या महत्व है जिसका मुनि श्री बहुत ही सरल और सौम्य तरीके से उत्तर देते हुये कहा नित्य पूजा, कल्पद्रुम पूजा समवशरण में बैठकर पूजा करता है उसे अनंत सुख की प्राप्ति होती है।ये समवशरण ज्यादा दिन का नहीं है जब तक आपके पुण्य भवितव्यता है तब तक का है।समवशरण में न कोई जीव बडा होता है न कोई छोटा है समवशरण का अर्थ समानता है। समवशरण में तो भगवान केवल भगवान बनने का उपदेश देते है। आयोजन समिति के प्रचार प्रसार संयोजक अभय जैन एवं नितिन चौधरी ने संयुक्त रुप से जानकारी में बताया कि इस अवसर पर नित्यमह अभिषेक पूजन एवं शांति धारा की गई।विधान में चक्रवर्ती के पात्र मनोज आराधना जैन पनवारी वालों के अलावा सकल दिगम्बर जैन समाज शामिल रहा।नगर के द्रोणागिरी भवन में चल रहा विधान ब्र.राकेश आगरा द्वारा विधि विधान पूर्वक संगीतकार मनीष जैन भोपाल द्वारा संगीतमय स्वर लहरियों में सम्पन्न कराया जा रहा है। आज 26 नवम्बर को रात्री में साढ़े 8 बजे सौधर्म इन्द्र द्वारा सभा आयोजित की जायेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

All rights reserved by "scn news india" copyright' -2007 -2019 - (Registerd-MP08D0011464/63122/2019/WEB)  Toll free No -07097298142
जनस
error: Content is protected !!