श्रद्धाजंलि समर्पित आलेख – तू दया का सागर है , तेरी एक बुंद के प्यासे हम

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आलेख :- रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढावाला
बाबू जी के जन्म के लगभग 14 साल बाद बनी फिल्म सीमा का वह भक्ति गीत मुझे आज 19 अक्टुबर 2020 को बरबस याद आ गया। 1955 में रीलिज स्वेत श्याम पर्दे की फिल्म सीमा के इस भक्ति गीत की रचना स्वर्गीय शैलेन्द्र ने की और इसे संगीत दिया शंकर – जयकिशन ने भक्ति गीत की आवाज बने स्वर्गीय मन्नाडे की मधुर आवाज में गाए इस भक्ति प्रार्थना में उस परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि
तू प्यार का सागर है
तेरी इक बूँद के प्यासे हम
लौटा जो दिया तुमने
चले जायेंगे जहां से हम
इस गीत को मैने अपने बाबू जी की भक्ति प्रार्थना में कुछ इस प्रकार देखा कि
तू दया का सागर है
तेरी इक बूँद के प्यासे हम
लौटा जो दिया तुमने
चले जायेंगे जहां से हम
19 मार्च 1941 को ग्राम रोंढ़ा में स्वर्गीय मंहग्या टुकड्या जी भोभाट एवं श्रीमति मीना बाई महंग्या जी भोभाट की प्रथम संतान के रूप में जन्मे मेरे बाबू जी दयाराम पंवार ने ग्राम रोंढ़ा में ही अपनी गरीब परिवारिक पस्थितियों में पढ़ाई की. उस समय तीसरी और सातवी बोर्ड हुआ करती थी. बाबू जी सातवी बोर्ड परीक्षा में फेल हो जाने के बाद आगे नही पढ़ सके और सीधे गांव के भैयालाल हजारे (बाबू जी की बुआ के लड़के) जो उस समय नाकेदार बन गए थे, उनकी सिफारीश पर बाबू जी भी जंगल विभाग (वन विभाग) की नौकरी करने के लिए घर से निकल गए थे. रोंढ़ा गांव से नाकेदार बनने वालो की कमी नही थी.

गांव के सबसे पहले नाकेदार बने नाकेदार बाबा ने ही गांव के लोगो के बीच नाकेदारी का चस्का लगाया. एक दर्जन से अधिक गांव के लोग नाकेदारी करने चले गए. कुछ बहुचर्चित नाकेदारो में देवराव बाबा जी का भी जिक्र आता है. बाबू जी ने कुछ दिनो तक जंगल विभाग में दैनिक हाथ मजदूरी की. इस बीच बाबू जी पर मुलताई के जयसवाल रेंजर साहब (बैतूल गंज के अनूप – सुनील – अनिल – जयसवाल  संचालक जयसवाल फोटो कापी सेंटर बस स्टैण्ड कोठी बाजार) की नज़र पड़ गई. वह दौर ऐसा था जब रेंजर सीधी भर्ती करने का अधिकार रखता था. बाबू जी मात्र 19 – 20 साल की उम्र में नाकेदार बन गए. बाबू जी की शुरूआती नौकरी रेंजर साहब की बंगले की थी उस दौर में रेंजर और छोटे साहब के पास सेवादार करने वाले विभागीय कर्मचारियों की भरमार होती थी. बाबू जी उस समय जयसवाल साहब के बड़े बेटे अनूप चाचा की देख – रेख में थे. अनूप चाचा बाबूजी से ऐसे घुल – मिल गए कि जयसवाल साहब की जीवन संगनी माता जी बाबू जी की सेवा भक्ति से इतनी प्रभावित हुई कि वे जीवन के आखरी दौर तक बाबू जी को अपना बड़ा बेटा ही मानती रही. कुछ दिनो तक उनकी शरण में रहने के बाद बाबू जी जयसवाल साहब का आर्शिवाद लेकर अपने कार्य स्थल पर पहुंच गए.


बारह गांवो का एक महाराज
यह अपने आप में चौकान्ने वाली बात है कि स्वंय दुसरो की सेवादारी करने वाला नाकेदार जब नाकेदार बनता है तो वह मात्र वन विभाग में नाकेदार नही होता बल्कि वह अपने बीट नाका क्षेत्र के 12 गांव का अघोषित महाराज होता था. मेरे हिसाब से किसी भी सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों को महाराज का दर्जा न तो मिला है और न वे  कहलाए गए है. जिन गांवो के नाको पर नाकेदार पदस्थ होता है वहां पर उनकी सेवा चाकरी में बारह गांव के लोग लगे रहते थे. यही जलवा जंगल में मंगल कहलाता था. उस दौर में गांव के लोग नाकेदार पर इतना भरोसा करते थे कि उनका पूरा घर परिवार महाराज की सेवा चाकरी में रहता था लेकिन किसी भी नाकेदार के चरित्र पर किसी ने भी ऊंगलिया नही उठाई. दारू से लेकर मूर्गा तक उन आदिवासियों एवं ग्रामिणो का होने के बाद भी वे जंगल से थके – हारे आए महाराज के हाथ – पांव दबाने तक का काम करते थे लेकिन मजाल है कि कोई दाग ऐसे दौर में किसी नाकेदार पर लगा हो. उस दौर में चरित्र सबसे बड़ी पंूजी हुआ करती थी. नाकेदार के भरोसे गांव के लोग अपने मुर्गा से मुर्गी लेकर मोड़ा – मोड़ी तक छोड़ कर जंगल में काम करने चले जाते थे।

लेकिन न तो उनके मुर्गा – मुर्गी का शिकार होता था न मोड़ा – मोड़ी किसी प्रकार के दुराचार – अत्याचार का शिकार बनते थे. अंधविश्वास का विश्वास में बदल जाना इतना आसान नहीं था लेकिन विश्वास के लिए स्वंय को अंधविश्वास की कसौटी पर खरा साबित करने के लिए सबसे बड़ी अग्रि परीक्षा देनी नही पड़ती थी.
सतपुड़ा के घने जंगलो में निकलने वाले काम के चलते गांव के लोगो को सीधे गांव में ही रोजगार मिल जाता था. जंगलो के कूपों की कटाई एवं छंटाई के काम में सौ – पचास मजदूर का काम पर आना एक बीट में आम दिनचर्या थी. बाबू जी की पोस्टींग बैतूल उतर वन मण्डल के जिन नाको पर रही उनमें गंवासेन, कनारी – पाट प्रमुख थे. गवासेन नाका हरदा – इन्दौर को जोड़ता था तथा कनारी पाट सीधे भौरा को जहां वन विभाग का डीपो था जिसमें जंगल से प्रतिदिन गाडिय़ा भर कर जाया करती थी. हरदा – इटारसी – होशंगाबाद के बड़े – बड़े जंगल विभाग के ठेकेदार डीपो तक जंगल कटाई की इमारती एवं सागौन की लकडिय़ा की ढुलाई का काम करते थे.


जानीवाकर के मनाने के बाद भी
बाबू जी मुम्बई जा नही सके ……..
जंगल विभाग में सरकारी नौकरी लगने के बाद बाबू जी की शादी हो गई लेकिन शादी के पहले और बाद में वे गवासेन,पोफल्या,बीजादेही,पंक्षी,टोकरा,कनारी,पाट, बिकलई में पदस्थ रहे. एक नाकेदार 12 गांवो का महाराज होता था. महाराज के बिना जंगल में पत्ता तक नहीं हिलता था. 1960 से 1964 का दौर बैतूल जिले के लिए शूटिंग पाइंट के रूप में सुर्खियो में था. स्व. जानीवाकर मध्यप्रदेश के इन्दौर के रहने वाले थे इसलिए वे बैतूल – होशंगाबाद के जंगलो में अकसर शिकार करने आया करते थे. उनके संग कई बार स्वर्गीय दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, नौशाद,भी शिकार करने के बहाने बैतूल जिले के पोफल्या के सर्किट हाऊस आ चुके है. अग्रेंजो के जमाने से ही पोफल्या, धाराखोह ऐसे चिन्हीत शिकार पांइट थे जिन्हे शूटिंग एरिया घोषित किया गया था. वन विभाग की ओर से शिकार करने आने वाले शिकारियों को पोफल्या का सर्किट हाऊस एवं जंगल विभाग की सीमाओ एवं जंगलो की तथा वन्य प्राणियों की आवा-जाही – मौजूदगी की जानकारी के लिए बतौर जंगल गाइड के लिए वन विभाग की ओर से सरकारी कर्मचारी उपलब्ध करवाये जाते थे.

साल में एक – दो बार फिल्मी कलाकार अकसर बैतूल आना – जाना करते थे. इस बीच पता नहीं कब और कैसे बाबू जी स्व. शम्मी कपूर और स्व. जानीवाकर के करीब आ गए. मोहम्मद रफी के गानो के शौकिन बाबू जी को जानीवाकर उस दौर की नामचीन अदाकार स्व. मीनाकुमारी के पास उनके बंगले में काम करने के लिए मुम्बई ले जाना चाहते थे. अपने परिवार में सबसे बड़े होने के कारण बाबू जी ने उनके संग जाने से मना कर दिया. बाबू जी सतपुड़ा के घने जंगलो के बीच पोफल्या,बीजादेही,पंक्षी,टोकरा,कनारी,पाट के नाको में नोकदार के रूप में रहे. रही.जानीवकार का प्रस्ताव शायद हम लोगो की तकदीर और तस्वीर बदल सकता था लेकिन मेरे पापा की दादी की $िजद के चलते वे बैतूल जिले से बाहर कहीं नही जा सके.


घर की बागूड़ में उनके लगाए बांसो से
पांच सौ से अधिक लोगो की अंतिम यात्रा
कहना नहीं चाहिए लेकिन पाथाखेड़ा का वीर कुंवर सिंह नगर जहां बाबू जी ने अंतिम सांस ली एयस घर के पीछे बगीचे की बागुड़ में लगाए उनके बांसो की ऐसी लहलहाती झाडिय़ा तैयार हुई कि उनके लगाए गए हरे – भरे – मोटे बांसो को लेने के लिए आने वालो की कमी नहीं रही है। पड़ौसी सलीम भाई कहते है कि हमारे बाबू जी के लगाए बांसो ने 500 सौ से अधिक लोगो को मोक्षाधाम पहुंचाया है। स्वंय भी 19 अक्टुबर को अपनी अंतिम यात्रा पर वे अपने ही लगाए हरे भरे मोटे बांसो पर चले गए। बाबू जी की पूरी नौकरी में उनका सेवानिवृति के पूर्व का दौर सरकारी नर्सरी में पेड़ पौधो की देख – रेख में ही बीता.बाबूजी ने लगभग 16 साल तक उतर वन मण्डल की नर्सरी संभाली. उनके हाथो की नर्सरी में बुडढ़ी रोपणी प्रमुख थी. बैतूल सर्किट हाऊस एवं जिला कलैक्टर कार्यालय के बीच उनके हाथो से तैयार की गई नर्सरी आज भले ही वन विभाग ने बर्बाद कर दी हो लेकिन एक दौर था उस नर्सरी का भी जहां पर लोग आया – जाया करते थे. बाबू जी पाथाखेड़ा में पदस्थ होने के बाद हमारा पूरा परिवार वहां पर बस गया. चार भाईयों एवं दो बहनो की शिक्षा – दीक्षा तथा शादी – विवाह का साक्षी बना वीर कुंवर सिंह नगर पाथाखेड़ा  जहां पर आज भी एक निवास है. चारो भाईयों का घर बसाने में बाबू जी की पूरी नौकरी चली गई. जब वे सेवानिवृत हुए तो वे काम पर जाना चाहते थे लेकिन पूरे परिवार ने उन्हे ऐसा करने से मना कर दिया. हम ऐसा मानते थे कि अब सेवा निवृत होने के बाद बाबूजी फ्री मन से धर्म – कर्म करे. बाबू जी एवं मां के साथ – साथ पूरा परिवार गायत्री परिवार से जुड़ गया. गायत्री स्कूल से शिक्षा हो या फिर गायत्री परिवार की दीक्षा बाबू जी मन – मन – धन से जुड़ेे रहे. वे एक बार अस्वस्थ होने के बाद नर्मदा जी की तीन महीने की यात्रा – परिक्रमा पर भी निकल गए लेकिन बीच में एक बार भी स्वास्थ बिगड़ जाने के बाद फिर वे नर्मदा परिक्रमा पूरी नहीं कर सके. मेरा रेवा नर्मदा जी के भक्तो मे शामिल थे.
गायत्री परिवार से जुड़े हमारे बाबू जी
सासंद के संग चार धाम की यात्रा पर…
वर्तमान सासंद डीडी उइके के परिवार के संग वे चारो धाम की यात्रा कर चुके है. श्री उइके पाथाखेड़ा में शिक्षक होने के साथ – साथ गयात्री परिवार से जुड़े होने के कारण उनका बाबू जी से मधुर सबंध रहे. उनके संग – संग वे कई बार देवभूमि ऋषिकेश – हरिद्धार में कुंभ मेले के समय आना – जाना करते रहे. बीते एक दशक से अधिक समय से लगातार पक्षघात की मार के शिकार बन चुके बाबू जी ने बोलना बंद किया और वे धीरे – धीरे शरीर से कमजोर होने लगे. बाबू जी लगभग 80 की ओर पहुंच रहे है. ऐसे में हर रात और हर सुबह और शाम बाबू जी की कब कौन सी $खबर आ जाए इसी पीड़ा से गुजरती है. ऐसे में उन्हे अपनी उम्र भी लग जाए जैसी दुआ करना उनकी तकलीफो बढ़ाने में पाप का कारण बनेगी. अस्वस्थ और तकलीफ भरे शरीर को मिलने वाली मुक्ति ही एक प्रकार से उनके प्रति अपनी सच्ची आस्था का कारण बन सकती है. क्योकि बीते एक दशक से साफ – साफ न बोल पाने वाले पीडि़त बाबू जी के शरीर को क्या तकलीफ है वे ही जानते है. आज जब हम बोल सकते है और अपनी पीड़ा को माँ और बाबू जी के नाम की पूकार के साथ व्यक्त कर सकते है ऐसे में तो सामने वाला बेचारा कुछ भी कह नहीं सकता और न कुछ ऐसा इशारा जिसे हम समझ सके. बाबू जी का तम्बाकु मांगना भर हमें समझ में आया है बाकि वे क्या कहते या क्या चाहते है हमें समझने के लिए माँ से ही बार – बार पुछना पड़ता है. बीते एक दशक से माँ ही बाबू जी की परछाई बनी है. हम पहले भी माँ से समझ कर बड़े हुए और आज भी समझ कर बुढ़े हो रहे है. मेरे बाबू जी जीवन के उस दौर से गुजर रहे है जब उनका लगभग पूरा संग – साथ इस दुनियां से चला गया. कुछ संगी – साथी बचे है वे जब आते है तो बाबू जी की अंाखो से लाचारी – बेबसी के आंसू झलक पड़ते है. मैं अकसर ऐसी पीड़ा को देख का व्यथित होकर कई बार माँ पुण्य सलिला सूर्यपुत्री ताप्ती से प्रार्थना करता हूं कि  हे माँ मोक्षदायनी पुण्य सलिला सूर्यपुत्री , संकट हरणी , पाप नाशिनी, संकट हरणी माँ मुझे चलती – फिरती मौत देना…..! लोग जीने के लिए दिन मांगते मैं हमेशा मौत मांगता हूं और वह ऐसी कि दुनिया देखे या फिर ऐसी हो कि किसी को पता भी न चले और सुमड़ी में दुमड़ी दबा कर चलते बने. आज मैं धीरे – धीरे साठ की ओर चला जा रहा हूं और साठ के बाद सठियाने से पहले माता रानी से प्रार्थना करता हूं कि हे माँ मेरे नि:शक्त शरीर को अब तकलीफ मुक्त कर क्योकि आज भी मरना है कल भी ऐसे में घुट – घुट कर मरने से बेहतर अच्छा है कि चलते फिरते रामटेक (स्वर्ग सिधार)

जाए.

मेरा यह आलेख मेरे बाबू जी को समर्पित है क्योकि मेरी पहचान आज भी मेरे बाबू जी से ही है. परिवार में सबसे बड़ा होने के कारण उनके प्यार और मार दोनो का मै एकाधिकार सुरक्षित वाला ऐसा अभिलेख हूं जो बीते 55 सालो उनके आर्शिवाद की छत्रछाया में फल – फूल रहा हूं. मेरे बाबू जी ने मुझे पढ़ाने से लेकर आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी यह बात अलग है कि मैं बीए पास नहीं हो सका और सरकारी नौकरी नहीं कर सका. हालांकि बाबू जी की सेवा चाकरी करने वाले आज नाकेदार से लेकर रेंजर तक बन  गए. बाबू जी ने मुझे पाथाखेड़ा की कोयला खदान में हाजरी बाबू से लेकर सारनी थर्मल पावर स्टेशन में बाबू गिरी पर लगवाने की कोशिस की लेकिन मैने ही सरकारी नौकरी के बदले अपनी पत्रकारिता को बेहतर अच्छा समझा. सरकारी नौकरी के बाद हो सकता कि मैं कुछ रूपये पैसे ज्यादा कमा कर खेतीबाड़ी – जमीन जायजाद बना लेता लेकिन एक बार फिर अपने बाबू जी की ओर देखता हूं तो याद आ जाता है वह सब कुछ जो हमें याद दिलाता है कि रंग बदलती गिरगीट सी दुनियां में कुछ भी काम नहीं आता. आज हमारे पास खेतीबाड़ी या जमीन जायजाद नही है उसके पीछे हम सुखी है क्योकि जमीन रहती तो भाईयों के बीच दिवारे बन जाती है. आज कम से कम चारो अपना- अपना कमा खा रहे है. ऐसे में बाबू जी के द्वारा हमे अपने पैर पर खड़ा कर देना उनकी सही मायने में हमारे प्रति पूर्ण जवाबदेही को प्रतिफलित दिखाता है. बीते समय में मैं अपने बाबू जी के प्रति क्या अपनी पूर्ण जवाबदेही को निभा पाया हूं …! मैं स्वंय को ऐसा करने में नि:शक्त मान चूका हूं क्योकि शरीर से नि:शक्त होने के बाद मैं स्वंय दुसरो की करूणा एवं दया का पात्र हूं. ऐसे में मैं अपने पिता की सेवा – चाकरी को पूरा न कर पाने का स्वंय को दोषी मान चुका हूं. आज जब मैं अपने पिता पालक को कंधा भी देकर चार कदम नहीं चल सका तब मुझे अहसास हुआ कि मैं अपने पिता के प्रति अपने कत्वर्य को पूरा न कर पाने के अपराध का दोषी हूं. इस अपराध बोध से मुझे मुक्ति शायद मिल न पाए इसलिए मैं बार – बार क्षमा याचना अपने पालक से करता हूं कि वे जाते – जाते अपने पुत्र को अपने नाम के अनुरूप दयाराम की दया का पात्र समझ कर अपने दयापात्र से आत्मा में घर कर गए अपराध बोध – बोझ से मुक्ति दिलाने की असीम कृपा कीजिए क्योकि बाबू जी हमारे आज पंचतत्व में लीन हो चुके है ऐसे में उनसे मै सिर्फ यही भक्ति प्रार्थना करता हूं कि  
तू प्यार का सागर है
तेरी इक बूँद के प्यासे हम
लौटा जो दिया तुमने
चले जायेंगे जहां से हम
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रामकिशोर पंवार