दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन धर्मसभा को मुनि श्री प्रशस्त सागर जी महाराज ने किया संबोधित धर्मों में बसे बड़ा धर्म है उत्तम ब्रह्मचर्य है- मुनि श्री

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अभिषेक जैन  

दमोह। मुनि श्री 108 प्रशस्त सागर जी महाराज ने दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिवस धर्मसभा को संबोधित करते कहा कि जिसने भी मेरी भावना की पंक्ति पड़ी है और अमल की है वह भगवान बनने की प्रक्रिया में शामिल हो जायेगा पंक्ति है- ‘‘जिसने राग द्वेश कामादिक, जीते सब जग जान लिया, सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निशप्रह हो उपदेश दिया’’ अंत भला सो सब भला ब्रह्मचर्य धर्म चेतन का भोग है और ईश्वर बनने का मार्ग है। प्राणी मात्र के कल्याण की भावना है स्वयें के विकारों को जीतकर वह सारे विश्व को जीत लेता है, गुरूदेव ने कहा है कि मिट्टी मिली थी, मिट्टी में मिली-मिट्टी गई मिट्टी में इस संसार में शरीर मिट्टी रूप है आसैर यह बार-बार मिलता आ रहा है, जब तक चेतन है स्वार्थ सिद्धी करते आ रहे है, फिर चेतन चला जाता है तो यह शरीर मिट्टी कहलाने लगता है और जब हम शव को जलाकर आते है तो दरवाजे के अन्दर नहाकर जाते है। इस मिट्टी से राग करोगे तो इंसान कहलाओगे और इस मिट्टी की वीतरागता दिगम्बरत्व को प्रदान करोगे तो भगवान बन जाओगे। आत्मा में आचरण करना ही ब्रह्मचर्य है अथवा जो आत्मा नहीं वे सारे के सारे अब्रह्म है वे कौन है यह शरीर जो आत्मा के साथ राग, द्वेश, विकारी, भाव को रखता है, ये आत्मा के विभाव है, स्वभाव नहीं पंचइंद्रिय के बिशय भोग जब तक शरीर में रहेंगें तब तक षरीर भव-भव संसार में भटकेगा। स्त्री मात्र को त्याग देना ब्रह्मचर्य नही है पांचों इंद्रियों के बिशय भोग इस आत्मा के परिणामों को असंयम अब्रह्म की ओर ले जाता है। श्रावक को ब्रह्मचर्य अंगीकार करना चाहिये इसी में कल्याण है। प्रवचन के पश्चात देश के ख्यातीप्राप्त विद्वान पं. श्री रतन लाल जी पं. श्री पन्नालाल जी आगरा, बालब्रह्मचारी संजीव जी भैया कटंगी का क्षेत्र कमेटी ने सम्मान किया एवं दशलक्षण के दौरान उपवास करने वालो को भी प्रतीक चिन्ह देकर सम्मान किया कमेटी की ओर से महामंत्री नवीन निराला ने पर्व के दौरान हुई त्रुटियों के लिये समस्त उपस्थित सभाजनों से क्षमा मांगी।

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