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प्रतिभा की पोषक परम्परा भोज के बाद भी भोपाल में प्रचलित

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  • प्रतिभा की पोषक परम्परा भोज के बाद भी भोपाल में प्रचलित
  • श्रीमती रेखा-श्री ज्ञानेश्वर चिकाने भोपाल द्वारा पालक की तरह किया गया प्रतिभाओं का पोषण- शिक्षण

श्रीमती-श्री मोहनलाल पवार भी रहे इसी परम्परा के प्रणेता
भोपाल। राजा भोज को प्रतिभाओं के उन्नयन और सम्मान के लिए याद किया जाता है। इसे सुखद संयोग ही माना जाएगा कि प्रतिभा की पोषक परम्परा भोज के बाद भी भोपाल में आज जीवित और प्रचलित है।

श्रीमती रेखा-श्री ज्ञानेश्वर चिकाने भोपाल द्वारा पालक की तरह अपने घर पर प्रतिभाओं का पोषण- शिक्षण किया गया। राजीव नगर स्थित अपने घर को चिकाने दम्पति द्वारा अपने रिश्तेदारों के बच्चों की शिक्षा दीक्षा के लिए समर्पित कर दिया गया। इसके पूर्व किराये के मकान में भी आपके द्वारा यह बड़प्पन बनाए रखा गया। आपके सानिध्य में अभिषेक, लोकेश और चित्तरंजन सम्मान जनक शिक्षा दीक्षा और पद पा चुके हैं वहीं अक्षत अभी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। पढ़ाई के इस परिवेश से आपके बेटे बेटी हिमांशु और दीक्षा भी लाभान्वित हुए।

श्रीमती रेखा-श्री ज्ञानेश्वर चिकाने का यह त्याग और समर्पण भले ही परिजन और उनके पुत्र याद करे या न करें, पर त्याग और समर्पण की इस डगर पर चलना हर किसी के लिए संभव भी नहीं है।

ज्ञात हो,श्रीमती-श्री मोहन लाल पवार भी रहे इसी परम्परा के प्रणेता रहे हैं और एमपी नगर स्थित अपने घर में अपने आत्मीय जनों के बच्चों को संरक्षण और शिक्षण देते रहे हैं और सभी सम्मान जनक पदों पर सेवारत हैं। व्यक्ति के जाने के बाद व्यक्ति को भूला दिया जाता है पर उसका काम उसे सदैव जीवित बनाए रखता है।
श्री मोहनलाल पवार भी ऐसे ही व्यक्तित्व है।

परहित में भी स्वहित का दोष दिया जाता है और हवन करते हाथ जलने की कहावत की तरह हाथ भी जलते है पर समय के प्रबंधन और सदुपयोग से जीवन संवरता भी है।