सहायक छोटी नदियों का अस्तित्व संकट में जनजागरण जरूरी

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संवाददाता सुनील यादव 

  • सहायक छोटी नदियों का अस्तित्व संकट में जनजागरण जरूरी
  • दतला नदी महोत्सव कार्यक्रम के तहत आयोजित हुई पत्रकार वार्ता, वाटर रिचार्जिंग एवम संरक्षण पर जोर

कटनी जिले में बड़ी नदियों की सहायक छोटी नदियों का अस्तित्व खतरे में आ गया है और निर्मित जल संकट कहीं ना कहीं इन्हीं सब कारणों से है लोगों को पानी का महत्व समझना होगा और जन जागरण आंदोलन और स्वयं की जिम्मेदारी समझकर जल संचय और जल संरक्षण के उपाय आगे आकर करने होंगे नहीं तो आने वाले दिनों में पानी मिलना मुश्किल हो सकता है यह बात होटल इंद्रपैलेस में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान दतला नदी महोत्सव कार्यक्रम एवं सचिव जय भारती शिक्षा केंद्र मझगवां जबलपुर संयोजक भारत नामदेव के द्वारा कही गई, उनके साथ सामाजिक कार्यकर्ता मोहन नागवानी एवं भोपाल से आए महेश दुबे भी मौजूद रहे।

श्री नामदेव ने ढीमरखेड़ा में स्थित दतला नदी को पुनर्जीवित करने का अभियान चलाया है और दतला नदी महोत्सव कार्यक्रम नाम रखा है उन्होंने बताया कि मां नर्मदा मुख्य नदी की प्रमुख नदी हिरण नदी की सहायक दतला नदी जिसकी लंबाई तो केवल 23 किलोमीटर है किंतु इसमें 6 छोटे नाले मिलाकर कुल लंबाई 86 किलोमीटर है इन सब जगह पर आवश्यक कार्य होने जरूरी है सहायक व छोटे नदी नाले दुर्दशा का शिकार है इन सब को पुनर्जीवित करना जरूरी है और इसके लिए जन सहयोग उससे भी ज्यादा जरूरी है। दतला नदी से लगे 21 गांव इसके पानी का उपयोग तो करते हैं लेकिन उसके संरक्षण की दिशा पर कोई काम नहीं करते हमारे द्वारा इसके संरक्षण व पुनर्जीवित करने की मुहिम के तहत 18 गांव में ग्राम रक्षा समितियों का गठन किया गया है और नदी की सुरक्षा एवं संरक्षण को लेकर लगातार काम कर रहे है। श्री नामदेव ने कहा की नदी को जीवित करने के महत्व और पानी के अपव्यय रोकने के संबंध में जागरूक करने के लिए नदी महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन विरासन माता कचनारी ढीमरखेड़ा में किया गया इस कार्यक्रम में अनेक विषय विशेषज्ञ ने अपने विचार रखे और जो सुझाव दिए उन पर मंथन किया गया और उन्हें संकल्पित कर मीडिया के माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार तक पहुंचाकर उसे पूरे प्रदेश में लागू कराना और प्रदेश को पानीदार बनाने व ग्रामीण भारत को मजबूती प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है।

आदिवासियों के साथ हुआ ऐतिहासिक अन्याय

सामाजिक कार्यकर्ता भारत नामदेव ने वन संसाधनों के अधिकार से आदिवासी समुदाय को वंचित रखने का भी आरोप लगाते हुए कहा कि अब तक आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है वन अधिकार अधिनियम 2006 के नियम 2008 एवं 2012 में वर्णित लघु वनोपज को बेचने का अधिकार है लेकिन यह लाभ तब मिलना है जब ग्राम सभा को वन संसाधनों के अधिकार जिला वन अधिकार समिति द्वारा दिए जाएं पर ऐसा हुआ नहीं । इस बड़े लाभ से आदिवासी समुदाय को वंचित रखा गया है। शासन के निर्देश के बावजूद ढीमरखेड़ा विकासखंड में 1 संसाधनों के 29 दावे खंड स्तरीय वन अधिकार समिति के पास पिछले 1 वर्ष से पढ़े हैं जब प्रकरण खंड स्तरीय वन अधिकार समिति के पास में आते हैं तब वन विकास निगम व वन विभाग वन संसाधनों पर अधिकार आवेदनों पर सहमति देने से कतराते है इसलिए अन्य विकास खंड में आवेदन ही नहीं करवाए गए ।
वन अधिकार अधिनियम आने के बाद से संगठनों के लंबे संघर्षों के बावजूद यह आदेश जारी हुआ इसमें महा ग्राम सभा जबलपुर के अध्यक्ष कमल सिंह मरावी एवं कटनी के जिला अध्यक्ष सीताराम बैगा दोनों को सरपंच चुना गया फिर भी कोई लाभ न मिला आदिवासियों के साथ जो ऐतिहासिक अन्याय वन विभाग वन संरक्षण अधिनियम 1927 अंग्रेजों के जंगल की लूट के लिए बनाया गया था वह आज भी अनवरत जारी है ।
विदित हो हाल ही में उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा तेंदूपत्ता बेचने के अधिकार संबंधी निर्णय दिया गया है किंतु जिले में वन संसाधनों पर अधिकार ही नहीं दिए गए हैं जिससे आदिवासी समुदाय ठगा महसूस कर रहा है।