चतुर्थ स्मरण पुण्यतिथि

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर

राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी

यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

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