बेचारी बनकर रह गई स्त्रियां- वन्दना

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आलेख -वन्दना जी

कहते हैं कि एक स्त्री के कई रूप होते हैं जैसे मां बेटी बहन पुत्री पत्नी साथ के लोगों के इनके प्रति अलग-अलग विचार भी होते है यह किसी के लिए देवी लक्ष्मी दुर्गा है तो किसी के लिए स्त्री का अर्थ मात्र कुलटा है और कुछ नहीं जबकि संसार ही नारी की देन है अगर नारी ही ना हो तो पृथ्वी पर मानव जीवन का अस्तित्व ही ना हो तो आज इस विषय की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं क्योंकि मैं स्वयं एक महिला और इस नाते वास्तव में हमारे प्रति क्या रवैया है समाज का मैं भलीभांति समझती हूं यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता अर्थात कि जहां पर स्त्रियों की पूजा अर्थात उनका मान सम्मान होता है वहां पर देवता स्वयं निवास करते हैं पर क्या यह सत्य है यह हो रहा है समाज में क्या हो रहा है महिला वर्ग का सम्मान तो बड़े शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस स्त्री की हमारे शास्त्रों में देवी माना गया है यहां तक कि देवताओं ने उसे देवी की संज्ञा दी है उसी स्त्री की आज इतनी दयनीय दशा है कि लोग देवी तो क्या स्त्री को स्त्री ही रहने दे तो भी बात बने बेचारी बनकर रह गई।

एक स्त्री की जिंदगी शादी से पहले पिता के सुने मां की सुने और भाई की सुने और शादी के बाद अच्छा पति मिल गया तो बहुत अच्छी किस्मत नहीं तो जीवन एक मर्द का पूरा हक है कि वह औरत को घर का नौकर बनाकर रखें साथ ही उसको भोग की वस्तु समझे उसका भोग करें और जब मन करे तो उसको इंसान भी ना समझे और जानवरों की तरह पीट दे तो क्या हम महिलाएं मात्र इन सब चीजों के लिए ही बनी है वैसे तो प्राचीन सभ्यता में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर का स्थान मिला था और आज भी बोला जाता है कि दोनों का ही स्थान बराबर है तो क्या यह वास्तव में सत्य है तो जहां तक मेरा मानना है कि यह सब मात्र है क्योंकि मैं एक औरत हूं और इसी समाज से हूं तो मेरे लिए स्वीकार करना बहुत ही कठिन है क्योंकि बराबरी का स्थान महिलाओं को ना कभी दिया गया है और ना ही दिया जाएगा यह सब मात्र लिखी बातें हैं

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