निविदाओं की बोली में हेराफेरी और गुटबंदी की दोषी पाई गई फर्मों पर लगाया जुर्माना

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मनोहर

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने आज सात (07) ऐसी कंपनियों/फर्मों के खिलाफ एक अंतिम आदेश जारी किया है जिन्हें प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (अधिनियम) की धारा 3(1) के साथ पढ़े जाने वाली धारा 3(3) (ए), 3(3)(बी), 3(3)(सी) और 3(3)(डी) के उन प्रावधानों का उल्लंघन करते पाया गया था, जो प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौतों को प्रतिबंधित करते हैं।

व्यवसाय समूहन अर्थात गुटबंदी (कार्टेलाइजिंग) कर रही संस्थाओं में से एक द्वारा कम दंड लगाने के आवेदन के आधार पर यह मामला शुरू किया गया था। अधिनियम की धारा 46 के अंतर्गत कोई भी कार्टेल सदस्य आयोग को कथित गुटबंदी (कार्टेल) के संबंध में पूर्ण, सही और महत्वपूर्ण खुलासे प्रदान करने के बदले में कम दंड की मांग करते हुए एक आवेदन दाखिल करके आयोग से संपर्क कर सकता है।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने पाया कि ये सात ( 07 ) कंपनियां/फर्में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारतीय रेलवे को प्रोटेक्टिव ट्यूब्स की आपूर्ति करने  की प्रक्रिया के अंतर्गत  कीमतों का निर्धारण, निविदाएं आवंटित करने, आपूर्ति और बाजार को नियंत्रित करने, बोली की कीमतों को समन्वयित करने और नीलामी प्रक्रिया के दौरान व्यवसाय समूहन अर्थात गुटबंदी (कार्टेलाइजिंग) कर रही थीं। इस मामले में जुटाए गए साक्ष्यों में पार्टियों के बीच नियमित ई-मेल सम्वाद और कुछ पार्टियों द्वारा एक ही आईपी पते से बोलियां दाखिल करना आदि शामिल थे।

इसके साथ ही सीसीआई द्वारा इन सात (07) प्रतिष्ठानों के दस (10) व्यक्तियों को भी अधिनियम की धारा 48 के प्रावधानों के अंतर्गत उनकी संबंधित कंपनियों/फर्मों के प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था।

सीसीआई ने अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के दोषी पाई गई कंपनियों/फर्मों और उनके कुछ व्यक्तियों पर औसत कारोबार/आय के 5% की दर से जुर्माना लगाया। तथापि, अधिनियम की धारा 46 के प्रावधानों के तहत अर्थ दंड में शत-प्रतिशत कमी का लाभ कम अर्थ दंड (शास्ति) के आवेदक को दिया गया। अर्थ दंड में कटौती के बाद, सीसीआई ने इन सभी पार्टियों को आगे से ऐसा नहीं करने का आदेश (सीज एन्ड डेसिस्ट आर्डर)  देने के अलावा लगभग 30 लाख रूपये का कुल अर्थ दंड (जुर्माना) अदा करने का निर्देश दिया।