हम जैसी अनुभूति करते हैं वैसा महसूस करते हैं -राष्ट्रसंत ललितप्रभ

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राजेश साबले जिला ब्यूरो 

बैतूल – जिंदगी में सुख और दुख दोनों महज हमारी अनुभूति होते हैं। हम जैसी अनुभूति करते हैं वैसा महसूस करते हैं। यदि हम सकारात्मक सोचेंगे तो निश्चित रूप से हमें सकारात्मक अनुभूति होगी। वहीं नकारात्मक सोचने पर हमारे मन में नकारात्मक विचारों की बाढ़ आ जाएगी। अब यह हमें सोचना है कि हम क्या और कैसा सोचते हैं? कुल मिलाकर हमारी सोच पर ही सब कुछ निर्भर रहता है। उक्त विचार जीवन जीने की कला पर प्रवचन देते हुए वरद मैरिज लॉन में सकल जैन समाज द्वारा आयोजित सत्संग के दौरान राष्ट्रसंत ललितप्रभ ने व्यक्त किए।

संतश्री की गाजे-बाजे से की आगवानी

राष्ट्रसंत ललित प्रभ के नगरागमन पर संत श्री की कीर्ति स्तंभ के पास भव्य आगवानी की गई। इस दौरान गाजे-बाजे के साथ महाराज को सत्संग स्थल वरद मैरिज गार्डन चक्कर रोड तक ले जाया गया। मार्ग में जगह-जगह राष्ट्र संत का भव्य स्वागत किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में स्वजातीय बंधु, गणमान्य नागरिक, श्रद्धालु सहित अन्य लोग मौजूद थे। सत्संग स्थल पर राष्ट्रसंत ललितप्रभ ने करीब डेढ़ घंटे जीवन जीने की कला पर प्रवचन दिए।

अस्थायी होते हैं सुख-दुख

संतश्री ने कहा कि यदि जीवन में खुश रहना है तो आपको पाजीटिव रहना ही पड़ेगा। बिना पाजीटिव सोच के आप जीवन में खुश नहीं रह सकते हो। पाजीटिव सोच एनर्जी प्रदान करती है और निगेटिव सोच एनर्जी चूसने का काम करती है। सुख और दुख दोनों स्थाई नहीं होते हैं। यदि दुख आया तो निश्चित रूप से सुख भी आएगा और यदि सुख आया है तो वह भी ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगा। राष्ट्रसंत ललित प्रभ ने कहा कि यदि हम दुख में भी अच्छा सोचेंगे तो दुख का एहसास नहीं होगा।

सब कुछ रहता है सोच पर निर्भर

राष्ट्रसंत ललित प्रभ ने कहा कि एक व्यक्ति इस बात से दुखी महसूस करता है कि गिलास में सिर्फ आधा पानी ही भरा हुआ है। जबकि दूसरा व्यक्ति इस बात से खुश होता है कि पूरा ना सही लेकिन आधा गिलास तो पानी से भरा हुआ है। यह दोनों की सोच ही उन्हें सुख और दुख की अनुभूति कराती है। मसलन यह है कि हम जैसा सोचते हैं ठीक उसी प्रकार से हम अनुभूतियां भी करते हैं। यही अनुभूतियां हमें दुख और सुख का एहसास कराती है।

त्याग और सहयोग से संयुक्त रहता है परिवार

सत्संग में जीवन जीने की कला पर प्रवचन देते हुए राष्ट्रसंत ललितप्रभ ने आज के दौर में संयुक्त परिवारों का विघटन परस्पर त्याग और सहयोग के अभाव में हो रहा है। उन्होंने कहा कि परिवार को बचाना और परिवार में कैसे रहना है यह भी जीवन जीने की एक कला है। उन्होंने कहा कि यदि परिवार के प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे के प्रति त्याग और परस्पर सहयोग की भावना रखेंगे तो निश्चित रूप से परिवार की जड़ें जहां मजबूत होंगी वहीं परिवार बचा रहेगा। वरना परिवार के साथ-साथ मकान के हाल के भी पाटिशन हो जाते हैं इसलिए परिवार को बचाकर रखें। यही जीवन जीने की कला है। इसमें हम सभी को जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक बंधु, महिलाएं, गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।