आचार्य शंकर ने भारत को एक सूत्र में जोडऩे का कार्य किया – महंत मदन गोपाल दास महाराज

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कामता तिवारी
संभागीय ब्यूरो रीवा
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चित्रकूट – मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद सतना के तत्वावधान में आदि गुरु शंकराचार्य जी की जयंती के उपलक्ष्य में “एकात्म पर्व” आचार्य शंकर जीवन व दर्शन “वैचारिक प्रबोधन” कार्यक्रम में दिनांक 9 मई 2022 को महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट के सी.एम.सी.एल.डी.पी. सभागार में मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. भरत मिश्रा कुलपति ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट द्वारा की गई कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रथम मुखारविन्द कामता चित्रकूट महंत श्री मदन गोपाल दास महाराज जी उपस्थित रहे। महाराज जी सहित सभी मंचासीन अतिथियों द्वारा मां सरस्वती जी, महात्मा गांधी जी व शंकराचार्य जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
वैचारिक प्रबोधन में विस्तार से आदि गुरु शंकराचार्य जी के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए श्री मदन गोपाल दास महाराज जी द्वारा कहा गया कि आदि शंकराचार्य की विद्वानता के कारण ही कहा जाता है कि उनकी जीभ पर माता सरस्वती का वास था। यही कारण है कि उन्होंने 32 वर्ष के संपूर्ण जीवनकाल में ही आदि शंकराचार्य ने अनेक महान धर्म ग्रंथ रच दिये। जो उनकी अलौकिक प्रतिभा को साबित करते हैं। भारत में चार मठों की स्थापना करने वाले जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की जयंती आज पूरा सनातन धर्म मना रहा है। शंकराचार्य का जन्म वैशाख की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आठवीं सदी में केरल में हुआ था। शंकराचार्य के पिता की मृत्यु उनके बचपन में ही हो गई थी। बचपन से ही शंकराचार्य का रुझान संन्यासी जीवन की तरफ था लेकिन उनकी मां नहीं चाहती थीं कि वो संन्यासी जीवन अपनाएं। कहा जाता है कि 8 साल की उम्र में एक बार शंकराचार्य जब अपनी मां शिवतारका के साथ नदी में स्नान के लिए गए हुए थे। वहां उन्हें
मगरमच्छ ने पकड़ लिया। जिसके बाद शंकराचार्य ने अपनी मां से कहा कि वो उन्हें संन्यासी बनने की अनुमति दे दे वरना ये मगरमच्छ उन्हें मार देगा। जिसके बाद उनकी मां ने उन्हें संन्यासी बनने की अनुमति दे दी। जिसके बाद शंकराचार्य को अद्वैत परम्परा के मठों के मुखिया के लिए प्रयोग की जाने वाली उपाधि माना जाता है। शंकराचार्य हिन्दू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है, जो बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप के बराबर समझा जाता है। इस पद की परम्परा आदि गुरु शंकराचार्य ने ही शुरू की थी। शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए भारत के 4 क्षेत्रों में चार मठ स्थापित किए उन्होंने अपने नाम वाले इस शंकराचार्य पद पर अपने चार मुख्य शिष्यों को बैठाया जिसके बाद इन चारों मठों में शंकराचार्य पद को निभाने की शुरुआत हुई। देशभर में धर्म और आध्यात्म के प्रसार के लिए 4 दिशाओं में चार मठों की स्थापना की गई, जिनका नाम है,ओडिशा का गोवर्धन मठ, कर्नाटक का शरदा शृंगेरीपीठ, गुजरात का द्वारका पीठ और उत्तराखंड का ज्योतिपीठ / जोशीमठ आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों में सबसे योग्यतम शिष्यों को मठाधीश बनाने की परंपरा शुरू की थी, जो आज भी प्रचलित है।
आदि शंकराचार्य कर्मयोगी, वेदों की प्रति गहन विचार शीलता, ईश्वरीय प्रेम, त्याग, पाण्डित्य से भरे अद्भुत गुणों की मूर्ति थे। आदि शंकराचार्य ने प्रखर ज्ञान और बुद्धि बल से ही 8 वर्ष की उम्र में चारों वेद और वेदांगों का ज्ञान प्राप्त किया। 12 वर्ष की उम्र में हिन्दू धर्म शास्त्रों की गूढ़ता में दक्ष बने और 16 वर्ष की अल्पायु में ब्रह्मसूत्र पर भाष्य रच दिया। यही कारण है कि आज भी हर सनातन धर्मावलंबी आदि शंकराचार्य को स्मरण कर स्वयं को धन्य मानता है। साथ ही उनके द्वारा स्थापित वैदिक धर्म का अनुसरण और पालन करते हैं। और भारत को एक सूत्र में जोडऩे का कार्य किया । शंकराचार्य का निधन 32 साल की उम्र में उत्तराखंड के केदारनाथ में हुआ।
कार्यशाला में उपस्थित स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधिगणों, आचार्यो, कोरोना वैलेंटीयर, प्रबुद्धजनों एवं छात्रों को सम्बोधित करते हुये कुलपति श्री मिश्रा जी ने कहा कि आचार्य शंकर ने सत्य की खोज में जीवन सर्वत्र समाज को एक सूत्र से जोडता है जिससे समाज को एक नई दिशा मिलती है। जिससे सम्पूर्ण भारत विभिन्नताओं के बाद भी एकात्मता की अनुभूति करता है यही हमारी सर्वोच्च सांस्कृतिक धरोहर एवं उच्च आदर्श हैं। अधिष्ठाता प्रबंधन संकाय व सी.एम.सी.एल.डी.पी. के निदेशक प्रो. अमरजीत सिंह ने आदि शंकराचार्य के राष्ट्रीय एकता और अखंडता की दिशा में किये गए योगदान को बताते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया।
दूसरे सत्र में मैं कोरोना वालेंटियर अभियान के वालंटियर्स को कुलपति प्रो भरत मिश्रा ने प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। प्रशस्ति पत्र वितरण सत्र का संचालन उप कुलसचिव डॉ जय शंकर मिश्रा ने किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में अधिष्ठाता डाँ. नन्दलाल मिश्रा,डॉ.आंजनेय पाण्डेय, डाँ.अमर जीत सिंह,डॉ.जय शंकर मिश्रा, डाँ. अजय आर चौरे,डाँ.नीलम चौरे व जन अभियान परिषद के जिला समन्वयक डॉ. राजेश तिवारी उपस्थित रहे। कार्यशाला का संचालन जिला समन्वयक डॉ. राजेश तिवारी द्वारा किया गया। आयेाजित कार्यशाला में डॉ. सूर्य प्रकाश शुक्ला, डॉ.जय शंकर प्रसाद मिश्रा, डॉ. अजय आर चौरे, डॉ.नीलम चौरे, डॉ.पी.एस. सिंह ,अनूप पाठक, श्याम सुन्दर मिश्रा,रामगोपाल पटेल, जयदीप सिंह, रामनरेश श्रीवास्तव, रामप्रसाद, आदित्य सहित विश्वविद्यालय के छात्र-छात्रा उपस्थित रहे।

कामता तिवारी
संभागीय ब्यूरो रीवा
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