संवेदनशीलता की मिसाल बने टीआई ज़हीर खान

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एड.फैजान पटेल 
भोपाल। देश भक्ति जनसेवा सिर्फ एक स्लोगन नहीं बल्कि एक देश भक्त के लिए ब्रह्मवाक्य हैं । दरअसल हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश की माटी में जन्मे शाहजहानाबाद थाना प्रभारी ज़हीर खान की। जिन्होंने एक बार फिर मानवता की एक मिसाल पेश की है। ज़हीर खान कहने को तो मध्यप्रदेश पुलिस में निरीक्षक के पद पर पदस्थ हैं। लेकिन निरीक्षक होने से पहले वे एक नेकदिल और संवेदनाओं से भरे बेहतरीन इंसान हैं। हाल ही में उनकी बेहतरी का एक ताजा उदाहरण सामने आया है। ज़हीर खान 4 और 5 मई की दरमियानी रात झांसी रेलवे स्टेशन पर एपी एक्सप्रेस ट्रेन में अपने परिवार के साथ सफर रहे थे । तभी एक पैसेंजर को दिल का दौरा पड़ा और वे फर्श पर पड़े पड़े तड़प रहा था। उसके साथ 15 साल का एक लड़का भी था जो ट्रेन में मौजूद यात्रियों से मदद की गुहार लगा रहा था। तभी एक मजबूर बेटे की आवाज़ ज़हीर खान को सुनाई पड़ी तो वे पीड़ित की मदद करने के लिए तत्काल उनके पास पहुंच गए। गाड़ी झांसी स्टेशन पर रुकी तो ज़हीर खान पीड़ित को लेकर स्टेशन पर उतर गए। परिवार को ट्रेन से रवाना कर दिया। इसके बाद ज़हीर खान पीड़ित को बचाने के लिए सबसे मदद की गुहार लगा रहे थे, लेकिन कोई भी पीड़ित की मदद करने के लिए आगे नहीं आया। झांसी में रेलवे स्टेशन पर पदस्थ पुलिस अधिकारी और रेलवे के अधिकारियों का असंवेदनशील चेहरा भी दिखाई दिया।
ज़हीर खान के सामने उस वक्त एक ही लक्ष्य था कि जैसे तैसे उस इंसान की जान बच जाए। और वो इसी संकल्प के साथ प्रयास कर रहे थे, तभी उन्हें स्टेशन पर माल ढोहने वाला हाथ ठेला दिखाई दिया जो कि कार्टून से भरा हुआ था । ज़हीर खान उस ठेले को खाली करके पीड़ित को ठेले पर लेटाकर स्टेशन के बाहर की तरफ धका कर ले जा रहे थे और स्टेशन पर मौजूद लोग तमाशबीन बनकर देख रहे थे। ज़हीर खान पीड़ित को करीब 800 मीटर तक ठेले पर धकाकर ले गए लेकिन समय पर उपचार और मदद नहीं मिलने के अभाव में पीड़ित की दुःखद मौत हो गई।
जिसका मलाल ज़हीर खान को आज भी है। उनके इस काम को देखते हुए आज रॉयल प्रेस क्लब ने उन्हें सम्मानित किया। इस मौके पर ज़हीर खान ने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर ,वकील पुलिस आईएएस अफसर बनना तो आसान है लेकिन एक अच्छा इंसान बनना बहुत मुश्किल है। इसलिए हर इंसान में इंसानियत होना बहुत जरूरी है जो कि झांसी स्टेशन पर किसी मे भी दिखाई नहीं दी। जबकि ज़हीर खान खुद एक पुलिस अधिकारी हैं और उनकी पत्नी भी पुलिस सेवा में पदस्थ हैं। उनकी पत्नी ने अपने गंतव्य पर पहुंचने के बाद ज़हीर खान को कॉल करके यही पूछा कि वो आदमी बचा या नहीं, सामान्यतः पत्नी यही पूछती है कि आप कब आओगे ? किस गाड़ी से आओगे ? सिर्फ इतना ही नहीं ज़हीर खान जब घर पहुंचे तो उनके 10 साल के बेटे ने भी झांसी में उतरने की वजह पूछते हुए यही कहा कि पापा मुझे भी आपके साथ मदद के लिए उतार लेते।
आपाधापी और भागदौड़ की ज़िंदगी मे इंसान इतना मतलबी और मौकापरस्त हो चुका है कि उसे दूसरे की ज़रा भी फिक्र नहीं रहती। लेकिन इंसान को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि कभी न कभी अकेले में उनके साथ भी ऐसा हादसा हो जाये तो उनकी मदद कौन करेगा? इसलिए पद से पहले इंसानियत को आगे रखना चाहिए।