भगवान पर विश्वास के बल से एक बालक भी निश्चिंत और निर्भय हो सकता है – स्वामी केशवानंद

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कामता तिवारी
संभागीय ब्यूरो रीवा
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रीवा-मानस भवन में चल रही भागवत कथा के चतुर्थ दिन स्वामी जी ने भगवान की महिमा बताते हुए कहा कि जगत में निर्भय और निश्चिंत भगवान के बल से एक बच्चा भी हो सकता है, जबकि धन पद और परिजन आदि के बल से बड़े-बड़े लोग भी निर्भय और निश्चिंत नहीं हो पाते हैं। यह प्रसंग वृंदावन के ग्वालो के जीवन को देखकर भी पता चलती है कि वह भगवान के बल से निर्भयता से अघासुर के मुंह में प्रवेश कर जाते हैं । प्रहलाद जी के जीवन से भी यही पता चलता है कि वह सिर्फ भगवान के बल से निर्भयता पूर्वक हिरण्यकश्यप के सामने खड़े रहते हैं । जीवन में सब कुछ भगवान प्रदान करते हैं आप बस भगवान पर विश्वास करो । धन की परिजन की किसी भी बात की आप चिंता मत करो क्योंकि चिंता करने से कुछ काम बनता नहीं है मन जरूर दुख या निराशा से भर जाता है । विश्वामित्र जी जो बड़े तपस्वी हो करके भी अपने जीवन का दुख अपने से नहीं मिटा पाए भगवान की शरण ली । जनक जी भी अपने दुख को अपने ज्ञान के बल से दूर नहीं कर पाये भगवान राम जी ने सीता के विवाह के समय जो दुख हो रहा था उसको दूर किया । बड़े-बड़े लोगों ने भी भगवान का आश्रय लेकर के ही दुख चिंता भय आदि से मुक्ति पाई है अतः जो विवेक वान है वह भगवान का जरूर आश्रय ले भगवान के आश्रय से निर्भयता निश्चिंता, संतोष और प्रसन्नता जीवन में आती है । समुद्र मंथन लीला का वर्णन करते समय स्वामी जी ने बताया कि जगत का सारा कार्य भगवान ही करते हैं लेकिन वह दिखते नहीं है इसलिए भगवान साकार रूप लेकर आते है । जगत में उसी का कार्य सिद्ध होता है सफल होता है जो भगवान का आश्रय ले लेता है उसको फल रूप में आनंद निर्भयता निश्चिंता मिलती है बाकी लोग कर्म करते हुए भी कर्म का जो वास्तविक फल है आनंद उसको नहीं प्राप्त कर पाते इसलिए समुद्र मंथन के प्रसंग को पढ़कर एक बात जरूर समझ में आती है कि जीव को जरूर ही भगवान की शरण ले लेनी चाहिए ।