कितनी यातनाये कितनी जिल्लत सहता है जमीनी रिपोर्टर

scn news india

महेंद्र की कलम से …

महज एक चालीस से पचास सेकेंड की बाइट के लिए क्या क्या सहता है एक रिपोर्टर और उसका वीडियो जर्नलिस्ट शायद किसी को एहसास नही होगा और हो भी तो कैसे क्योंकि जब इन रिपोर्टर्स से हर दिन बाख़बर रहने वाले दफ्तरी सम्पादकों बड़े पेट के चैनल मालिकों को इनकी फिक्र नही तब आम आवाम को भला कैसे सरोकार रखे ? सजी सवारी बाइट टी वी के सुनहरे पर्दे पर देखने वाले दर्शको दरसल जिस तेज तर्रार पत्रकारिता और बेबाक पत्रकारिता की गलतफहमी आप पाले हो वो सही मायने में ज़िल्लत से भरी पत्रकारिता हो चली है। महज 40 से 50 सेकेंड की एक बाइट के लिए तपती दोहरी 42 डिग्री तापमान में खुले आसमान के नींचे घण्टो बिताने के बाद एक सफेदपोश नेता लाखों की कार से उतरता है और उस पर खबरनवीसों के साथ ऐसा आचरण करता है जैसे भिखारी कटोरा लिये खड़े हों और उसका भीख देने का मन ना हो। फिर भी आश या उम्मीद नही टूटती। मंचों से बड़ी बड़ी दलील देने वाला वही सफेदपोश वापस जाता है तो हाँथ में आई डी माइक लिए जमीनी रिपोर्टर फिर आशावादी बन जाता है कि शायद माइक देख कर नेता करीब आ जाये जरा आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं तो दो दो कोंडी के नेताओं की सिक्योरिटी धक्का मुक्की तक पर आमादा हो जाती है पर उनकी मजबूरी भी कह सकते हैं क्योंकि इन सफेदपोशो को कुछ हो गया सिर्फ थप्पड़ ही पड़ गया तो उनकी तो रोजी रोटी पर संकट छा सकता है । फिर भी भीड़ में धक्के खाते पत्रकार नेता के करीब पहुंच भी गए और नेता की जुबान चलना शुरू हुई तो कलेजे को तसल्ली मिलने लगती है पर कई दफा अंजाम एम पी के विदिशा में टी वी रिपोर्टर्स के साथ जो हुआ कुछ इसी तरह का होता है। क्या गुनाह किया था बदजुबान सपा नेता आजम खां से पत्रकारों ने पूँछकर की भाजपा नेत्री जया प्रदा पर जो अमर्यादित टिप्पड़ी आपने की उस पर प्रतिक्रिया क्या है। जवाब क्या मिला इनके वालिद मतलब पिता की मौत पर यहां आया हूँ। कल्पना कीजिये जिस पत्रकार से बदजुबान आजम खान ने ये बात कही उस पर क्या गुजरी होगी। जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई इस वीडियो को पत्रकारों के घर परिवार वालो और उनके पिता ने देखा सुना होगा तो उन्हें कितनी ग्लानि हुई होगी कि इस दिन के लिए उन्होंने अपने बेटे को पत्रकार या टी वी रिपोर्टर बनाया था ? इतनी जिल्लत के बाद भी खुद की जिल्लत को जमाने तक पहुंचाने का काम भी किस तरह कलेजे पर पत्थर रखकर विदिशा के पत्रकारों ने अपने चेनल्स में भेजा होगा जमाने को ये बताया होगा कि किस तरह से एक बाइट के लिए जिल्लत झेलनी पड़ती है। उतने पर भी चेनल्स के बड़े दफ्तरों में बैठे सम्पादकों मालिकों ने हजार सवाल दागे होंगे कि कितनी सच्चाई है कि आजम खान की जबान से ये सब निकला और उतने पर चन्द सेकेंड की औपचारिकता करके खबर खत्म कर दी होगी। जिन चेनल्स में जरा गैरत बाकी होगी उन्होंने जया प्रदा के ऊपर की गई टिप्पड़ी के वीडियो के साथ इस वीडियो को भी मर्ज किया होगा और घण्टो बाद इस घटनाक्रम को भूलकर फिर किसी बदजुबानी की खबर को तलाशने के निर्देश जमीनी रिपोर्टर्स की कौम को दिए होंगे। यही सब किसी सम्पादक के साथ घटा होता तो शायद कोई और नही पर वो चेनल तो एक दो दिन इस मुद्दे को भुनाता। किसी मालिक के साथ हुआ होता तो ए सी चेम्बर में बैठे जाबांज पत्रकारों का ज़मीर जाग जाता । आजम खान कुख्यात की श्रेणी में खड़ा हो जाता देश भर से इस बदजुबान नेता पर टिप्पड़ियो की बाढ़ नही सुनामी आ जाती और पता नही क्या क्या होता। देश के दिग्गज नेता ट्वीट करते पर ये घटा तो जमीनी पत्रकार के साथ ही जिसके हाँथ में कुछ नही है बस तपते रहो जिल्लत झेलते रहो और फिर अगले दिन किसी नई जिल्लत को झेलने तैयार हो जाओ। ये सब पहली दफा नही हो रहा बल्कि अक्सर ये सब देश भर के जमीन से जुड़े रिपोर्टर्स झेलते है पर उनकी सुध लेने वाला कोई नही है। जया प्रदा पर जो अशलील टिप्पड़ी आजम खान ने की निश्चित ही उस टिप्पड़ी की आलोचना होनी चाहिये ये वाकई नारी शक्ति का अपमान है और इस सार्वजनिक मंच पर में भी घोर निंदा करता हूँ लेकिन उतनी हो आलोचना इस घटनाक्रम पर भी होनी चाहिए। चन्द घण्टो तक खबर में कुछ सेकेंड का ये घटनाक्रम बताकर ना चैनल्स अपनी इतिश्री कर सकते हैं ना ही नेता और ना ही हमारा समाज। वालिद का साया क्या होता है इसका एहसास बदजुबान आजम को हे या नही मुझे नही पता और ये भी नही जानता कि वो अपने वालिद साहब की इज्जत करते हैं या नही कभी खुद के वालिद के इंतकाल की कल्पना की है या नही पर इतना जरूर है कि आजम खान के वालिद साहब ने उन्हें ये तालीम तो नही दी होगी कि वो किसी महिला के बारे में अश्लील भाषा का इस्तेमाल करें किसी के वालिद की ऐसी मातमपुर्सी करें। इन घटनाक्रमो ने यकीनन आजम खां की पारवारिक तालीम पर जरूर सवालिया निशान लगा दिए हैं और आजम ने अपना सम्मान तो खोया ही साथ ही अपने माता पिता के संस्कारों को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। सवाल उन नेताओं से भी है जो सोशल मीडिया पर जया प्रदा पर की गई टिप्पड़ी पर ट्वीटर फेसबुक पर अफसोस जाहिर करते हुए आजम पर बरस रहे हैं पर पत्रकारों पर की हुई टिप्पड़ी पर खामोश हैं। यदि पत्रकारों की जगह किसी स्थापित कद्दावर नेता या नेत्री के वालिद की मातमपुर्सी का बयान आया होता तो विलाप अर्स तक पहुंच जाता । सवाल ये भी की क्या इज्जत सिर्फ़ सफेदपोशों की बस है ? क्या पत्रकारों के वालिद कुछ नही ? अफसोस तो इस बात का भी है कि जिस रामपुर और विदिशा शहर में सरेआम आजम खान ने ये बोला उन जगहों पर वहां के लोग तो होंगे क्या उनकी जिम्मेदारी नही की वो ऐसे बदजुबानियो को जवाब देते। जया प्रदा रामपुर की नेत्री हैं यकीनन इतने सालों में किसी ने उन्हें बहिन कहा होगा किसी ने बेटी और जब इन शब्दों के संबोधन से उन्हें पुकारा जाता रहा तो रामपुर के लोगों की गैरत क्या मर गई थी क्या पूरे पंडाल में ऐसा कोई नही था जो अपनी बहिन बेटी की तरह जया प्रदा के सम्मान को महसूस करता। तुरन्त जवाब देता पर सच तो यही है कि तालिया पीटते नारे लगाते रामपुर के लोग कायरता का लबादा ओढ़ कर ये सब ना सिर्फ सुन रहे थे बल्कि अपनी सहमति भी दे रहे थे। जिस विदिशा में आजम ने पत्रकार के पिता की मौत को लेकर कहा क्या वो पत्रकार विदिशा या एम पी या देश का बेटा नही है । भले ही आजम को उनकी पार्टी या समर्थकों ने बुलाया था उनका सम्मान करना उनकी विवशता होगी लेकिन अपने शहर के बेटे के साथ किसी ने बदसलूकी की तो विदिशा के लोगों का फर्ज था कि तुरन्त माकूल जवाब देना था ताकि फिर कोई ये हिमाकत ना कर पाए और जबान पर लगाम लग जाये। सच है और जहां तक मेरा मानना है कि यदि रामपुर और विदिशा के लोगों ने तुरन्त ही आजम खान को जवाब दे दिया होता तो शायद वो बड़ी खबर बनती और आजम को आवाम से मिले जवाब के बाद देश के दूसरे बदजुबानियो को भी सबक मिलता की किसी पर अभद्र टिप्पड़ी का जवाब अब आवाम या जनता देने लगी है औऱ फिर सोच समझ कर ऐसे घटिया लोगों की जबान चलती।
विदिशा के घटनाक्रम के बाद शायद जनता को या कहें कि टी वी के दर्शकों को इस बात का एहसास हो गया होगा कि खबरिया चेनल्स में आप जो सजा संवरा देख रहे है दरअसल वो जिल्लत की छन्नी से छना हुआ पानी है जिसके अंदर की कड़वाहट का आपको एहसास नही होता बस पर्दे पर मिठास आपको दिखाई देती है। बड़े दफ्तरों के सम्पादकों और जिम्मेदारों को इस एक और घटना से अब सबक लेना चाहिए कि आपका या आपके चेनल का असली किरदार जमीन पर रिपोर्टिंग करने वाला रिपोर्टर या पत्रकार ही है जो हर दिन अपना आत्मसम्मान खोकर आपके चेनल का पेट भरता है अखबारों के सोलह और बीस पन्नो की पूर्ति करता है पर कभी सवाल पूंछने पर पिटता है कभी खाली कुर्सियों की असलियत दिखाने पर सफेद पोशों के गुर्गों चमचों के कहर का शिकार होकर लहूलुहान होता है लेकिन उसे फिर भी कोई सपोर्ट नही मिलता। चन्द अवसरों पर पत्रकारों के सम्मान में कसीदे पढ़ने वाले नेताओं सिर्फ कोरे आश्वासनों से कुछ नही होता बल्कि असलियत में तुम्हारे सम्मान की दरकार इन खबरनवीसों को है। इसके साथ ही समाज का भी फर्ज है कि पत्रकार समाज की लड़ाई ही लड़ता है जनता के हित के सवाल उठाता है और बदले में उसे यातनाएं और जिल्लत नसीब हो तो फिर समाज का कायराना पन ही ये है । बदजुबान आजम खान पर चुनाव आयोग ने 72 घण्टे तक चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगा दिया है शायद फिलहाल आयोग इतना ही कर सकता था उसने किया और आयोग प्रशंसा और साधुवाद का पात्र है पर क्या हमारा मीडिया ऐसे बदजुबानियो पर स्थाई प्रतिबन्ध नही लगा सकता? खबरों की सुर्खियों से ऐसे बदजुबानियो को अलग थलग कर दीजिए अपने आप ना सिर्फ उनकी हेकड़ी उतरेगी बल्कि औरों को भी सबक मिलेगा की जबान सोचसमझकर चलाना है। और सबसे अहम किरदार तो रामपुर उत्तरप्रदेश और देश की जनता निभा सकती है कि वो ऐसे लोगों को समाज मे मान सम्मान पद प्रतिष्ठा देना बंद कर दे सारी हेकड़ी निकल जायेगी क्योंकि ऐसे बदजुबानी जब एक महिला नेत्री के साथ ऐसी बयानबाजी कर सकते हैं तो उनका मुँह किसी भी वाशिंदे की बहन बेटियों के खिलाफ भी चल सकता है । जब वो खबरनवीस के वालिद या पिता पर टिप्पड़ी कर सकता है तो अपने मतदाता अपने गावँ शहर के लोगों पर भी अमर्यादित टिप्पड़ी दे सकता है। में एक पत्रकार के नाते से तो ठीक एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक होने के नाते आजम खां जैसे बदजुबानी की घोर निंदा करता हूँ और लोगों से आग्रह भी करता हूँ कि वो भी देशव्यापी निंदा करें आवाम सबक सिखाये ताकि फिर किसी बहिन बेटी की इज्जत पर कोई बोल ना सके और फिर कोई बेटा अपने पिता के बारे में ऐसा सुनने को मजबूर ना हो।
महेंद्र दुबे दमोह मध्यप्रदेश
9425095553

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!