अति प्राचीन भगवान्  शिव का यह धाम जहाँ भगवान् शिव का सिंदूर से होता है अभिषेक

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मनीष मालवीय जिला ब्यूरों 

होशंगाबाद इटारसी // शहर से 17 किलोमीटर दूर स्थित भगवान भोलेनाथ का प्रसिद्ध शिवालय तिलक सिंदूर धाम है। सावन मास में यहां भक्तों का ताता लगा रहता है। यहां पर दूर-दूर से भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने लोग आते हैं और उनकी मनोकामना भी पूरी होती है। यहां पर फिल्म कलाकार गोविंदा से लेकर कई राजनेताओं का आनाजाना लगा रहता हैं। तिलक सिंदूर मंदिर का पौराणिक और धार्मिक महत्व है। यह एकमात्र शिवलिंग है जहाँ पर भोलेनाथ को सिंदूर चढाय़ा जाता है इसलिए इनको तिलकसिंदूर कहा जाता हैं।

यह शिवरात्रि पर दो दिवसीय अदिबासी मेला का भी आयोजन किया जाता है। बताया जाता हैं कि तिलक सिंदूर पहले मकड़ई के शाह परिवार की रियासत का हिस्सा था। यहां पूजन के लिए पहले शाह परिवार द्वारा ही भुमका नियुक्त किया जाता था। यहां पर 1925 से मेला लगाने की शुरूआत जमानी के माल गुजार द्वारा की गई। 1970 से इस स्थान को जनपद पंचायत केसला द्वारा टेक ओवर कर लिया गया। यहां बना गुफा मंदिर अतिप्राचीन हैं वहीं 1971 में पार्वती महल का निर्माण हुआ। देश में एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जिसे सिंदूर चढ़ाया जाता है।

ओमकारेश्वर के बाद यह दूसरा स्थान हैं जहां चतुष्कोणीय जलहेरी है। यह बमबम बाबा जैसे कई सिद्ध पुरूषों की तपोस्थली रही है। गणेश जी ने जब सिंदूर नामक राक्षस का वध किया तो उसके सिंदूरी खून से शिवजी का अभिषेक यहीं पर किया गया था । यहां पर नंदी के ऊपर शंकर भगवान की ऐसी मूर्ति है जो देश में दूसरी नहीं है। सतपुड़ा की पहाडिय़ों पर पचमढ़ी से टिमरनी के बीच गौंड़ राजाओं का राज्य था। इन राजाओं ने ही तिलक सिंदूर में शिवालय की स्थापना की थी। गौंड़ जनजाति बड़े देव को मानते हैं इसलिए तिलकसिंदूर में भगवान शिव को बड़े देव का कहा जाता है। तिलक सिंदूर में साधना कर रहे लाल बाबा ने बताया कि तिलकसिंदूर में पहाड़ी पर शिवालय है और सामने हंसगंगा नदी है। हंसगंगा नदी के पार श्मशान है। इस श्मशान में आसपास बसे करीब 15 गांवों के लोग दाह संस्कार करते हैं। शिवालय के आसपास श्मशान होना एक खास महत्व रखता है।

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